नानाजी देशमुख पुण्यतिथि विशेष - ग्रामोदय व अंत्योदय के अखंड उपासक

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Updated: 27 Feb 2021, 08:02 AM IST

- नानाजी देशमुख करोड़ों भारतीयों के बीच एक रत्न थे। वे राजनीति में रहकर भी रचनाधर्मी और सृजनकारी थे।

प्रभात झा

काजल की कोठरी में रहकर बिना कालिख लगे निकल जाना, आज के युग में लोग इसे आठवां आश्चर्य ही मानते हैं। राजनीति अपने लिए नहीं, अपनों के लिए नहीं, वरन् देश के लिए कार्य करने का सामथ्र्य जिस महापुरुष में था, वे थे भारत रत्न नानाजी देशमुख। सच में नानाजी देशमुख करोड़ों भारतीयों के बीच एक रत्न थे। वे कार्यों से रत्न थे। कार्यों से ऋषि थे। वे ग्रामोदय और अंत्योदय के अखंड उपासक थे। वे राजनीति में रहकर भी रचनाधर्मी और सृजनकारी थे। उन्होंने स्कूल को स्कूल नहीं कहा, सरस्वती शिशु मंदिर कहा। नानाजी देशमुख द्वारा बोया गया बीज ही आज पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक विद्या भारती द्वारा सरस्वती शिशु मंदिरों के रूप में पोषित और पल्लवित हो रहा है। भारतीय संस्कृति से दूर रहकर भारत का विद्यार्थी मां सरस्वती की आराधना भला कैसे कर सकता है? धरोहर को धरा पर नानाजी देशमुख ने न केवल उतारा, बल्कि आज 28 लाख बच्चे विद्या भारती विद्यालयों के आंचल में अध्ययन कर रहे हैं। नानाजी का संबंध धनाढ्य लोगों से रहा, परंतु उन्होंने धन का उपयोग ग्रामोदय और अंत्योदय में किया। ग्राम उनकी पूजा थे। उन पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बहुत प्रभाव था। खास बात यह है कि वे सत्ता की चकाचौंध से कभी प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने सत्ता को सेवा से जोड़ा। वे जनसंघ के जो प्रमुख प्रारंभिक स्तंभ थे, उनमें से एक थे। आरएसएस की शाखा से निकले और आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का सान्निध्य प्राप्त कर वे जनसंघ के विचार को फैलाने के लिए निकले।

आपातकाल में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ कदम से कदम मिलाकर गुप्त क्रांति की प्रेरणा नानाजी देशमुख ने दी। नानाजी देशमुख कहा करते थे, 'हौसले से बड़ा हथियार नहीं होता।' जयप्रकाश नारायण के हौसले का नाम नानाजी देशमुख था। जयप्रकाश नारायण नानाजी से अटूट प्रेम करते थे। यही कारण था कि आपातकाल के दौरान जेल में रहने के बाद रोशनी देने वाले में जो अग्रणी थे, वे थे जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। वर्ष १९77 में जनता पार्टी की सरकार बनी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई सहित अनेक नेताओं ने आग्रह किया कि नानाजी जनसंघ कोटे से मंत्री बनें, लेकिन वे सत्ता की चकाचौंध में संगठन छोडऩे को तैयार नहीं थे। उन्होंने कह दिया, 'मैं 60 वर्ष के बाद राजनीति से संन्यास ले लूंगा।' वे 60 साल के हुए और अपने शब्दों को आचरण का परिधान पहनाते हुए उन्होंने घोषणा की, 'मैं राजनीति से संन्यास लेता हूं, सेवा से नहीं।'

नानाजी देशमुख 27 फरवरी 2010 को अपनी काया छोड़कर चले गए। वे इतने महान् थे कि उन्होंने दधीचि की तरह अपना प्रत्येक अंग दान कर दिया था। उन्होंने जीवित रहते कह दिया था, 'अंग जो भी काम का हो, दूसरे जीवन के लिए उपयोग में ले लेना चाहिए।' वे काया से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनकी विचार-छाया में दीनदयाल शोध संस्थान अपने प्रकल्पों के माध्यम से भारतवर्ष में एक नया कीर्तिमान बना रहा है।
(लेखक भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद हैं)