उसे भी मजबूर करें

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Updated: 18 Jun 2020, 07:31 AM IST

भारतीय विदेश विभाग की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है कि पिछले सत्तर वर्षों में सभी पड़ोसी मित्र देशों को शत्रु बना दिया। भारत-पाक जैसे मुद्दे को हल नहीं कर पाए। हमारा पंचशील मृत पड़ा है। 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' ने जो पीठ में छुरा घोंपा उसके घाव अभी हरे हैं।

- गुलाब कोठारी

भारतीय विदेश विभाग की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है कि पिछले सत्तर वर्षों में सभी पड़ोसी मित्र देशों को शत्रु बना दिया। भारत-पाक जैसे मुद्दे को हल नहीं कर पाए। हमारा पंचशील मृत पड़ा है। 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' ने जो पीठ में छुरा घोंपा उसके घाव अभी हरे हैं। आज भी सचाई यही है कि विदेश नीतियां चुनी हुई सरकारें नहीं, बल्कि अधिकारी ही बना रहे हैं। अब तो राजदूत भी वे ही बन रहे हैं। न ये दूध से जलते हैं, न ही छाछ पीते हैं। देश की खातिर कोई भी अपना घर बेचने वाला नहीं है। दूरदर्शिता का ही प्रमाण हम देख रहे हैं, भोग रहे हैं कि सोमवार को दोपहर शान्ति वार्ता और रात को आक्रमण। सन् 1962 का इतिहास दोहरा दिया गया और हम? चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के मीठे गाने गा रहे थे। विदेश विभाग राजनयिक यात्राओं से क्यों कर भ्रमित हो जाता है। क्योंकि वे लोग बुद्धिमान तो होते हैं, समझदार नहीं। जिसको जमीन में गडऩे से परहेज हो, वह पेड़ बनने के सपने देखे? सरकारें बदलती रहती हैं, मुद्दों का स्वरूप नहीं बदलता।

चीन हर देश के साथ दोगला रहा है। आक्रामक मानसिकता रखता है। साम्राज्यवादी नीतियों के कारण आसपास के सभी देश आतंकित हैं। आज तो अमरीका, आस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों में भी चीन के पांव उखडऩे लग गए। जो धन उद्योगों में लगा रहा है, कोरोना ने उस आय के द्वार बन्द कर दिए। उद्योग लौटने लगे। बेरोजगारी बढऩे लगी। उससे भी बड़ा झटका लगा कोरोना के प्रसार को लेकर। विश्व पटल पर हुई बदनामी से ध्यान हटाने का मार्ग ढूढ़ रहा है।

भारत के साथ वार्ता भी करता है, तोड़ता भी है। जब से तिब्बत का मुद्दा उठा है, दलाई लामा को भारत ने शरण दी है, चीन की आंखों में भारत खटक रहा है। उसके बाद कितने अवसर आए जब चीन ने आक्रामक रूप दिखाया। और हम आंखें मूंदे रहे। अक्साई चीन का मुद्दा, अरुणाचल प्रदेश पर झपट्टा, पाकिस्तान की धरती पर कॉरिडोर, पीओके का मुद्दा और लद्दाख के बड़े हिस्से का कब्जा। किसके दिल में दर्द उठा? किसने देश में कोई कसम खाई! न हम आगे की सोचते हैं, न दुश्मन से सावधान होते हैं। क्या बीस सैनिकों की शहादत का कोई अर्थ नहीं है! रक्षा विभाग क्या उत्तर देता रहा है, पिछले 70 सालों में देश के सामने है। कैसी ठिठोली का दृश्य लगता है जब दो शत्रु सेनाएं बिना हथियारों के, हाथापाई करके लड़-मरती हैं। हमारे 4,71,378 करोड़ के रक्षा बजट को भी धिक्कार है।

देश के पड़ोस में चारों ओर हमारे प्रति जो वातावरण है, उसके चलते सारे विदेशी दौरे और विदेशी शासनाध्यक्षों की बैठकों और भारत यात्राओं की पोल खुल जाती है। भारत-चीन का मुद्दा इतना हल्का नहीं है, जितना हम मानकर चल रहे हैं। हमारी लाखों वर्ग किलोमीटर भूमि चीन दबाए बैठा है। न हमारे रक्षा विभाग के पास उत्तर है, न ही विदेश विभाग के पास। हमें तब आश्चर्य क्यों है जब चीन, नेपाल, पाकिस्तान अपने देश के नक्शों में हमारे क्षेत्रों को दिखाते हैं।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि आज चीन का अर्थ-तंत्र हमारे से अधिक सशक्त है। आज इस नाव में छेद हो रहे हैं। लोग चीन से भाग रहे हैं। उधर, अमरीका ने व्यापार पर अनेक पाबन्दियां लगा दी हैं। तब भारत ही एकमात्र बड़ा बाजार नजर आता है। हमारे पास सख्ती के साथ बात रखने का यह श्रेष्ठ अवसर है। हालांकि, 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे ने चीन के होश उड़ा दिए हैं, फिर भी चीन पर व्यापारिक प्रतिबन्ध उसे झुकने पर मजबूर करेगा। यह भी तब संभव है, जब-एक, हमारी आर्थिक विकास की गति सुधर सके।

आज तो वह दिन दूर ही है। दो-क्या हमारे पास चीन से अलग होने के विकल्प हैं? हमारे उद्योगों का बड़ा हिस्सा चीन पर निर्भर है। छोटे व्यापारी और उद्यमी चीन के घटिया और सस्ते माल से त्रस्त हैं। हमारे कितने विदेशी मित्र चीन के विरुद्ध आर्थिक संघर्ष में हमारा साथ देंगे?

चीन का वर्तमान आक्रामक रवैया भी गीदड़ भभकी ही है। उसे अपने देशवासियों का ध्यान भी बांटना है, भारतीय नीतियों और तैयारियों का आकलन भी करना है, देश में बड़े उद्योगों के पलायन को रोकना भी है। भारत का अमरीकी झुकाव, जी-7 की सदस्यता भी उसकी आंखों में खटक रही है। अपने को चारों ओर से घिरता देखकर 'आक्रमण को रक्षा कवच' मान बैठा है, जिससे उसका हित दूर-दूर भी नहीं है। इस तथ्य को वह जानता है।

जो भी हो, उसकी वह जाने। हमारी तो हमें ही तय करनी चाहिए। चीन पर हम क्यों भरोसा कर लेते हैं-इसका उत्तर देश मांगता है। हर बार धोखा खाते हैं, कुछ जमीन से हाथ भी धो बैठते हैं, किन्तु चीन को सतर्क रहने के लिए कभी मजबूर नहीं कर पाए। यही तो हमारी कूटनीतिक हार है। आज जब चीन और नेपाल (हमारा पूर्व अंग) भी साथ हो लिए, दोनों आक्रामक हो लिए, तब हम क्यों गलियां निकाल रहे हैं, मुंह छिपाने के लिए। ऐसा समझदार शत्रु तो सबसे बड़ा हितैषी होता है, जो आपको सोने नहीं देता। हम फिर भी अगर सोते रहें, मौज-मस्ती करते रहें, विदेश यात्राओं के ग्लैमर में डूबे रहें, तो भगवान भी सहायता नहीं करेगा। भारत को दिशा तय करनी होगी, गंभीरता, संकल्प की दृढ़ता, पंचशील की गरिमा भी दिखानी होगी और आंखें भी।