आत्म-दर्शन - मैत्री भाव बढ़ाएं

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Published: 27 Jan 2021, 10:02 AM IST

विद्या-विभूति, यश-वैभव, साधन संपन्नता एवं लौकिक-पारलौकिक अनुकूलताओं के रूप में जो कुछ भी प्राप्त है, वह ईश्वरीय उपहार है।

स्वामी अवधेशानंद गिरी, आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा

कर्तापन का अभिमान आध्यात्मिक पथ की मूल बाधा है। अहमन्यता के अवसान होते ही दैवत्व का आरोहण होने लगता है और जीवन में समस्त दिव्यताएंं स्वत: प्रकट होने लगती हैं। विद्या-विभूति, यश-वैभव, साधन संपन्नता एवं लौकिक-पारलौकिक अनुकूलताओं के रूप में जो कुछ भी प्राप्त है, वह ईश्वरीय उपहार है। अत: प्राप्त के प्रति प्रासादिक भाव रखें।

सरल-विनम्र और निराभिमानी जीवन अभ्यासी बनें। जिसे अपना कुशल करना है और परम पद निर्वाण उपलब्ध करना है, उसे चाहिए कि वह सुयोग्य बने, सरल बने, सुभाषी बने, मृदु स्वभावी बने, निरभिमानी बने और संतुष्ट रहे। थोड़े में अपना पोषण करे, दीर्घसूत्री योजनाओं में न उलझा रहे, सादगी का जीवन अपनाए, शांत इन्द्रिय बने, दुस्साहसी न हो, दुराचरण न करे और मन में सदैव यही भाव रखे कि सभी प्राणी सुखी हों, निर्भय हों एवं आत्म-सुखलाभी हों। इसलिए अपमान न करें, क्रोध या वैमनस्य के वशीभूत होकर एक-दूसरे के दु:ख की कामना न करें। जिस प्रकार जान की भी बाजी लगाकर मां अपने पुत्र की रक्षा करती है, उसी प्रकार वह भी समस्त प्राणियों के प्रति अपने मन में अपरिमित मैत्रीभाव बढ़ाए।

जब तक निद्रा के आधीन नहीं हैं, तब तक खड़े, बैठे या लेटे हर अवस्था में इस अपरिमित मैत्री भावना की जागरूकता को कायम रखें। इसे ही भगवान ने ब्रह्म विहार कहा है। अज्ञानता, आत्म-विस्मृति और अविवेक ही समस्त दुखों की मूल जड़ है। सत्संग, स्वाध्याय और संत सन्निधि ही कल्याणकारी है।