हिन्दी आज ज्ञान शून्य : समझना होगा कि भाषा विषय भी है, ज्ञान भी और संस्कृति भी

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Published: 14 Sep 2021, 09:03 AM IST

आज हमारे सामने एक ही विकल्प रह गया है- हिन्दी में सारा पुरातन ज्ञान भण्डार पुन: उपलब्ध कराएं। यह शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचे, जन-जन तक पहुंचे।

- गुलाब कोठारी

हमारे देश में ज्ञान की परिभाषा है- एकोज्ञानं ज्ञानं, विविधं ज्ञानं विज्ञानम्। सभी प्राणियों में एक ही ब्रह्म (आत्मा) है, इसको जानना ज्ञान है। इस एक से विश्व कैसे बनता है, इसको जानना विज्ञान है। आज ज्ञान, शिक्षा से बाहर हो गया। विज्ञान हमारे जीवन का थोपा हुआ आधार बन गया। जिस अन्न को ब्रह्म कहा, वह विज्ञान द्वारा विष बन गया। भवन निर्माण, जलवायु के विपरीत कष्टकारक बन गया। किसी डॉक्टर को नहीं मालूम कि प्रत्येक प्राणी के तीन शरीर हैं। जो विश्व का पिता है-सूर्य- वह 'फादर्स डे' में सिमट गया। जो गुरु, मोक्ष तक साथ रहता है, वह 'टीचर' बनकर, हर साल बदल जाता है। सूचनाओं और जानकारियों को ज्ञान मान लिया। प्रज्ञा पुरुष तो अब पैदा ही नहीं होंगे। परिणाम क्या हुआ- आज किसी का अपमान होने का अर्थ रहा है- 'उसकी हिन्दी कर दी'।

'कोस-कोस पर पानी और वाणी के बदलाव वाले हमारे देश में भाषाओं का समृद्ध इतिहास रहा है। हर भाषा में ज्ञान के साथ ही संस्कृति की विशिष्टता जुड़ी होती है।भाषा ही सामूहिक स्मृति और ज्ञान को जीवित रखने का सबसे बड़ा माध्यम है। इसीलिए कोई भाषा लुप्त होती है तो उससे जुड़े समूह का ज्ञान भी लुप्त हो जाता है। और, कोई भाषा समृद्ध होने लगे तो उससे जुड़े समूह का ज्ञान भी समृद्ध होता जाता है। समय के साथ परिवर्तन हर क्षेत्र में होते हैं। भारत भी हिन्दुस्तान कहा गया, हिन्दी हमारी भाषा बनी। समय के साथ नाम बदल गया। आज 'इण्डिया देट इज भारत' कहने लगे हैं। हिन्दी का यह हाल हो गया। हमें हिन्दी बोलकर गर्व ही नहीं होता। आज भी अंग्रेजी के आगे इसकी द्वितीय श्रेणी की स्थिति है। बीमार दिखाई पड़ती है। इसका एक कारण तो इसकी पितृ संस्था संस्कृत का सिमट जाना है। संस्कृत अब शिक्षण संस्थाओं एवं संस्कृतज्ञों तक टिकी हुई है। भाषाओं में 'अफसर' हो गई। आम आदमी से कोई नाता-रिश्ता नहीं रह गया। देवताओं की भाषा बन गई। इसकी मार हिन्दी को झेलनी पड़ी है। देश की सारी पुरा ज्ञान-सम्पदा भी संस्कृत के साथ सिमट गई। संस्कृति का मुख्य आधार ही खिसक गया। कहावतों और मुहावरों के अध्याय तो शायद शिक्षकों तक भी नहीं पहुंच रहे। सबके सब कच्चे रह गए।

संस्कृत को देश की सबसे प्राचीन भाषा माना जाता है। और, यह भी तथ्य है कि हिन्दी का जन्म संस्कृत की कोख से ही हुआ है। रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ और व्याकरण आदि संस्कृत के दौर की उपलब्धि हैं। संस्कृत भी उस दौर में दो भागों में थी। इनमें एक वैदिक संस्कृत का आज भी वैसा ही स्वरूप है। दूसरी लौकिक संस्कृत से पाली, प्राकृत और अपभ्रंश का विकास १००० ईस्वी तक हुआ। अपभ्रंश के ही सरल व देशज शब्दों को अवहट्ट कहा गया। डिंगल-पिंगल तथा खड़ी बोली और अन्य प्रमुख बोलियों के साथ अवहट्ट से हिन्दी का उद्भव हुआ। इसी हिन्दी से कई भारतीय भाषाओं और उपभाषाओं का भी जन्म हुआ। इसी दौर में बौद्ध-जैन और नाथ-सिद्ध आदि साहित्य के रूप में अमूल्य धरोहर उपलब्ध हुई।

स्थिति यह है कि ब्रिटिश सरकार और इंग्लैण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने अंगे्रजी के शब्दकोश निर्माण में उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके पचास से अधिक शब्दकोश एक से बढ़कर एक कारगर प्रमाणित हुए हैं। दूसरी ओर हमारे यहां केन्द्र सरकार का एकमात्र केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा में है जो मान्य विश्वविद्यालय के समकक्ष है। एक छोटा अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश ही उसके खाते में है। वहीं हैदराबाद में केन्द्र सरकार का ही 'सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट फॉर इंग्लिश एंड फॉरेन लेंग्वेजेज' भी है। दोनों के कामकाज का अन्तर देखने से भी स्पष्ट हो जाएगा।

हमारी तकनीकी शब्दावली भी बैसाखियों पर टिकी है। अंग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद में भी प्रतिबद्धता कहीं नहीं दिखती। यही कारण है कि संस्कृत-हिन्दी के लोकप्रिय कोश में भी करीब 80 प्रतिशत कार्य मोनियर विलियम्स का प्रतिध्वनित होता दिखाई पड़ता है। भारतीय ज्ञानपीठ के 1965 से अब तक 54 बार के साहित्य पुरस्कारों में हिन्दी साहित्य को कन्नड़ साहित्य की भांति सात बार स्थान मिला है। आज श्रेष्ठ साहित्य के लिए अनूदित पुस्तकों का आश्रय लेना होता है।

आज हिन्दी दिवस के मौके पर हमें नए सिरे से इसके स्वरूप के पुनर्निर्माण पर चिन्तन करना चाहिए। दुश्मन तो चारों ओर हैं, बलवान भी हैं, किन्तु संकल्प के आगे ठहर नहीं सकते। यह भी एक महाभारत ही होगा। लड़ेगे और जीतेंगे। हमें शब्दों के आगे सोचना होगा। शब्द-ब्रह्म तक विचार करना होगा। सबसे पहले तो संस्कृत की बैसाखियों को छोड़कर स्वतंत्र स्वरूप में हिन्दी को प्रतिष्ठित करना होगा। घरों में मां-बाप को तथा पाठशालाओं में शिक्षकों को जागरूक करना होगा। बच्चों को 'ए फॉर एपल' के बजाय 'अ से अनार' सिखाना पड़ेगा। माताओं का शिक्षण अधिक महत्त्वपूर्ण है। बच्चों के साथ सर्वाधिक समय उनका बीतता है। वे ही छोटे बच्चों को 'गृहकार्य' करवाती हैं। वे ही कोख में भी जीवन का प्रकाश भरती हैं।

सवाल यह है कि जितनी मेहनत हम अंग्रेजी सीखने में करते हैं, उतनी मेहनत हम अपने ही भारत देश की किसी और भाषा को सीखने में क्यों नहीं करते हैं? पाश्चात्य अथवा अंग्रेजी संस्कृति को दोष देने से पहले प्रत्येक भारतीय को आत्मावलोकन करना चाहिए कि वह खुद अपनी संस्कृति के प्रति कितना निष्ठावान है। जिस भाषा को अंग्रेजों ने हम पर थोपा, उसे लोग बड़े शौक से अपनी दिनचर्या में शामिल कर रहे हैं। अंग्रेज तो इस देश से चले गए, पर अंग्रेजियत हावी है। जब भी हिन्दी दिवस आता है, हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह का आयोजन कर, हिन्दी पर लम्बे-लम्बे वक्तव्य देकर, प्रतियोगिता आयोजित कर कुछ लोगों को हिन्दी के नाम पर सम्मान, इनाम देकर इतिश्री कर ली जाती है। यही हाल 'फादर्स डे', 'मदर्स डे' का भी है। माता-पिता का सम्मान ग्रीटिंग कार्ड-चाकलेट-केक जैसे बाजार में सिमट गया।

हमारे देश में भाषायी संघर्ष को कहीं जगह नहीं होनी चाहिए। यह तभी संभव होगा जबजितना हिन्दी को आगे बढ़ाने का काम हो उतना ही क्षेत्रीय भाषाओं को भी वरीयता मिले। जरूरत रोजगार के अवसरों की भी है। हिन्दी में व्यावसायिक शिक्षा देने वाले संस्थान भी हों। यदि हिन्दी पढऩे वालों को अंगे्रजी के विद्यार्थियों के समान ही मौका मिले तो कम से कम हम हिन्दी पट्टी में तो हिन्दी को जन-जन की भाषा बना ही देंगे। जरूरत भाषा भेद के बजाए ज्ञान पर आधारित रोजगार देने की है। यह काम सरकारें भी करें और निजी क्षेत्र भी। देश का प्रत्येक नागरिक यह ठान ले कि वह चाहे कितनी ही भाषाएं सीखे लेकिन हिन्दी पढऩा-लिखना व बोलना अवश्य सीखेगा। तो हम हिन्दी को उसका खोया सम्मान वापस लौटा पाएंगे, इसमें संदेह नहीं।

कभी भारत जगतगुरु था। आज भी संभव है। हमें प्राचीन ज्ञान को संस्कृत के पिंजरे से बाहर लाना पड़ेगा। हिन्दी के पतन का एक ही कारण है- यह संस्कृत की बैसाखियों पर टिकी है। संस्कृत तो इतिहास से चिपक कर रह गई। परिवर्तन से जुडऩे की, नए विषय, नई जीवन-शैली को अपनाने की तैयारी भी नहीं है। जो ज्ञान संस्कृत में समाहित है, उसी के आधार पर हिन्दी साहित्य समृद्ध हुआ। आज फिर हिन्दी में 'ज्ञान' उपलब्ध ही नहीं है।

नई पीढ़ी को भविष्य की तैयारी करनी होती है। संस्कृत में भविष्य नहीं है। वही तो कर्मकाण्ड की नींव है। आज तो अनुष्ठान भी पढ़कर कराए जाते हैं। विषय के गूढ़ अर्थों से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। नई पीढ़ी ज्ञान की भूखी है, बुद्धिमान व ऊर्जावान है। उसके समक्ष भारतीय ज्ञान (उसकी भाषा में) उपलब्ध नहीं है। विज्ञान है सामने। उसमें आकर्षण, उपकरण एवं तकनीक है। साथ ही उसके प्रश्नों के उत्तर हैं। निश्चित ही वह पीढ़ी विज्ञान से ही जुड़ेगी। संस्कृत शोधशून्य होती जा रही है। संस्कृत का ज्ञान अन्य भाषायी युवावर्ग को शिक्षा में उपलब्ध ही नहीं है।

एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जो हमारे नीति-निर्माताओं की समझ से परे रहा है वह यह है कि भाषा ही जीवन-शैली बन जाती है। भाषा विषय भी है, ज्ञान भी है और संस्कृति भी है। आजादी के संघर्ष में हिन्दी ने दिलों में राष्ट्र भावों की संस्कृति का निर्माण किया था। लेकिन हमारे शासकों ने अंग्रेजी संस्कृति को इतना सींचा कि हर शिक्षित वर्ग हिन्दी से दूर भागने लगा। हमारी परम्पराएं, उत्सव और यहां तक कि शब्दकोश तक नए नहीं बने। मदर्स डे-टीचर्स डे की तरह एक दिन का हिन्दी दिवस हो गया। जिनको 365 दिन पूजा जाता था, वे सब एक दिन के भगवान बनकर रह गए।

हमारी वर्णमाला का हर वर्ण एक मंत्र है। हमारा शरीर भी इन्हीं मंत्रों का बना हुआ है। भाषा के स्पन्दनों का प्रभाव रक्त को प्रभावित करता है। वह व्यक्ति को निरोगी भी कर सकता है और रोगी भी। मातृभाषा का देवत्व इसी से समझा जा सकता है।

आज हमारे सामने एक ही विकल्प रह गया है- हिन्दी में सारा पुरातन ज्ञान भण्डार पुन: उपलब्ध कराएं। यह शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचे, जन-जन तक पहुंचे। संस्कृत सरकार की गोद में ही बड़ी हो सकती है। हिन्दी को घेरे से मुक्त करके स्वतंत्र भाषा की तरह ज्ञान-गंगा के रूप में ही अभियान चलाना पड़ेगा। संस्कृत तो नए युग में उपयोगी तभी होगी, जब इसमें निहित ज्ञान आज के विषयों में उपलब्ध होगा। समयानुसार शोध कार्य, विषय निष्ठा के साथ किए जाएं। विश्वविद्यालयों के शोध ग्रन्थ पेट भरने के लिए ही उपयुक्त हैं, भारत को पुन: विश्वगुरु बनाने में सक्षम नहीं हैं। सारे विश्वविद्यालय आज भी 'सायण भाष्य' के रूप में ही वेद पढ़ा रहे हैं। इनमें 'ज्ञान का गुरुत्व' प्रकट करने का प्रयास ही आज की आवश्यकता है।

हिन्दी या मातृभाषा

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