इतिहास गवाह है जनसंख्या में गिरावट पर चिंता बेमानी

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Published: 21 Jul 2021, 10:00 AM IST

जब-जब प्रजनन दर को नीति निर्धारण का आधार बनाया गया, तब-तब इसके गंभीर परिणाम सामने आए हैं।
दुनिया में कहीं कमी, कहीं वृद्धि से लगता है चिंता पर विराम।

मैथली श्रीनिवास, (ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी, द वाशिंगटन पोस्ट)

'जनसंख्या में गिरावट' का डर दुनिया में चिंता की वजह बन रहा है। अमरीका, यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में प्रजनन दर में गिरावट को देखते हुए माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में बच्चे कम होंगे और अर्थव्यवस्था में भी मंदी रहेगी। यानी भविष्य की चिंताजनक तस्वीर ऐसी होगी, जिसमें बच्चा गाड़ी से लेकर खेल के मैदान तक खाली नजर आएंगे। प्रजनन दर में गिरावट पहली बार चिंता का कारण नहीं बनी है। इसकी शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में हुई, जब वैश्विक मृत्यु दर में गिरावट आ रही थी लेकिन प्रजनन दर उच्चतर बनी हुई थी। नतीजा खास तौर पर एशिया व अफ्रीका के उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के रूप में सामने आया।

चूंकि अमरीका ने आव्रजन कानून में थोड़ी ढील दे दी थी, इसलिए उसे डर था कि विकासशील देशों की बढ़ती आबादी उनके अपने श्वेत नागरिकों पर भारी पड़ेगी। इसी सोच के चलते नस्लवाद को बल मिला। ऐसी आशंकाओं के कारण पर्यावरण, प्रजनन अधिकार और परोपकारी संगठनों के एक नेटवर्क ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रचार शुरू कर दिया। इन समूहों ने पूर्व में गुलाम रहे देशों की सरकारों के साथ गठबंधन बनाए, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण अभियान को आर्थिक विकास को गति देने और गरीबों की संख्या घटाने का जरिया मान लिया। अमरीका में इसी के चलते 60 व 70 के दशक में अश्वेत महिलाओं का जबरन बंध्याकरण करवाया गया। ऐसा अमरीका के बाहर भी हुआ। भारत में 1960 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण के लिए इंट्रयूटरिन डिवाइस (आइयूडी) अभियान को अमरीका का समर्थन मिला। पहले ही वर्ष में करीब 8 लाख महिलाओं को आइयूडी लगाया गया। महिलाओं की प्रजनन दर कम करने पर केंद्रित यह कार्यक्रम महिलाओं के लिए कई मायनों में अपमानजनक साबित हुआ। गरीबी, स्थान परिवर्तन, साक्षरता या मातृ व नवजात मृत्यु दर जैसी समस्याओं के समाधान के बजाय महिलाओं की प्रजनन दर को ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए खतरा मान लिया गया। तर्क दिया गया कि बच्चे कम हों तो महिलाओं की कुछ समस्याओं का हल स्वत: हो जाता है। अंतत: जनसंख्या विस्फोट का डर खत्म हुआ, नई तकनीकों के सहारे किसान ज्यादा खाद्यान्न उगाने लगे। यह वह दौर था जब अकाल भी आसन्न नहीं लग रहा था।

आर्थिक व सामाजिक बदलावों के बीच फिर वह दौर देखा गया जब कई देशों में जन्म व मृत्यु दर में समान रूप से गिरावट देखी गई। जनसांख्यिकी विशेषज्ञ इसे 'प्रजनन संक्रांति' अवस्था कहते हैं। विश्व भर में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ गई। आज समस्या विपरीत है, यह है - घटती जनसंख्या की। ऐसे में हम जनसंख्या के बारे में क्या नया दृष्टिकोण अपना सकते हैं। हमें स्वीकारना ही होगा कि आबादी के आंकड़ों को लेकर चिंता को लगभग हमेशा इसके नस्लीय स्वरूप से उपजे डर से अलग नहीं किया जा सकता। अब भी विश्व की आबादी को लेकर यही अनुमान है कि अगले दशक तक इसमें 10 प्रतिशत की वृद्धि हो जाएगी। वह इसलिए, क्योंकि कुछ देशों, ज्यादातर अफ्रीकी देशों में प्रति महिला प्रजनन दर औसतन विस्थापन स्तर 2.1 से ज्यादा है। मतलब वहां जनसंख्या वृद्धि जारी रहेगी। भारत जैसे देशों में भी कुछ समय तक ऐसी ही संभावना है, कारण बड़ी आबादी का प्रजनन के लिए अनुकूल उम्र में प्रवेश करना है।

अतीत में देखा गया है कि जब विश्व के विभिन्न हिस्सों में जनसंख्या वृद्धि दर कहीं कम तो कहीं ज्यादा होती है, तब जनसंख्या से जुड़ी चिंताओं पर विराम लग जाता है। जब-जब प्रजनन दर को नीति निर्धारण का आधार बनाया गया, तब-तब इसके गंभीर परिणाम सामने आए हैं। जनता के प्रजनन संबंधी निर्णय के समर्थन के लिए जरूरी नहीं कि जनसंख्या से जुड़ी चिंता पर निर्भर हुआ जाए, चाहे वह वृद्धि हो या गिरावट।