आख्यान : पुण्य का भागी बना देता है सज्जनों का सानिध्य

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Published: 30 Jun 2021, 09:01 AM IST

लोभ में ही सही, माता पार्वती के बराबर वर्षों तक तपस्या करने पर ही माता का वाहन होने का वरदान परमपिता ब्रह्मा से मिला था सिंह को ।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख, (पौराणिक पात्रों और कथानकों पर लेखन)

मार्कण्डेय पुराण में एक कथा आती है, कैलाश पर बैठे भगवान शिव ने एक बार माता पार्वती को परिहास में 'काली' कह दिया। माता पार्वती को भी यह परिहास चुभ गया। वे शिव से रुष्ट हो कर यह कहते हुए चली गईं कि अब जब तक मेरा रंग गौर नहीं हो जाता मैं वापस नहीं आऊंगी।

रुष्ट माता पार्वती एक निर्जन वन में चली गईं। वहां एक ऊंची पर्वत चोटी थी, जिस पर किसी भी दिशा से चढ़ पाना सम्भव नहीं था। माता को वह शांत स्थान पसंद आया। वे आकाश मार्ग से उस पर्वत चोटी पर पहुंच कर परमपिता ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगीं। वहीं वन में घूमते एक सिंह की दृष्टि जब चोटी पर तप कर रही पार्वती पर पड़ी तो वह उन्हें मार कर खा जाने को व्यग्र हो गया। किन्तु उस पर्वत चोटी पर पहुंच पाना कहीं से भी सम्भव नहीं था, सो वह वहीं नीचे खड़ा हो कर प्रतीक्षा करने लगा कि जब यह स्त्री गिरेगी तो मैं इसे मार कर खा जाऊंगा। इधर, माता को तपस्या करते-करते वर्षों बीत गए। नीचे खड़ा सिंह भी यों ही चुपचाप खड़ा रहा। उनकी लम्बी तपस्या से जब ब्रह्मदेव प्रसन्न हुए तो उन्होंने दर्शन दे कर उनसे वर मांगने को कहा। तब माता पार्वती ने कहा, मेरे बराबर ही तपस्या इस सिंह ने भी की है, सो मुझसे पहले इस सिंह को वर मिलना चाहिए। सिंह लोभ में ही सही, पर वर्षों तक माता के साथ रहा था, सो प्रसन्न ब्रह्मदेव ने उस सिंह को माता का वाहन होने, भगवान शिव की भक्ति और उनके समस्त गणों का नायक होने का वरदान दिया। उसे किसी से भी पराजित नहीं होने और अनन्त काल तक जीवित रहने का भी वरदान मिला।

सज्जन व्यक्तियों के सानिध्य में रहना, या किसी के अच्छे कार्यों से अनचाहे में जुड़ जाना भी मनुष्य को पुण्य का भागी बना देता है और उसके अनेक दोष छिप जाते हैं। इसीलिए जीवन में सदैव सज्जनों की संगत तलाशनी चाहिए। सिंह को इसी संगत का लाभ मिला था। सिंह को वर देने के बाद ब्रह्मदेव ने माता पार्वती की इच्छानुसार उन्हे गौर वर्ण प्रदान किया। प्रसन्न पार्वती कैलाश लौट आईं और शिव के साथ सुखपूर्वक रहने लगीं।