कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के नतीजे भुगत रहा चीन

|

Published: 10 Jun 2021, 08:41 AM IST

1980 की परिवार नियोजन की नीति आज बनी जनसंख्या संकट...
चीन में संतान सुख महंगा हो गया है, क्योंकि आर्थिक वृद्धि के बावजूद प्रति व्यक्ति आय पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया की आधी से भी कम है

डेविड वान ड्रेहल, स्तम्भकार

ताकतवर सरकारों के विरुद्ध सबसे बेहतर तर्कों को निचोड़ मुख्यत: दो सिद्धांत हैं। पहला, 'भीड़ की बुद्धिमता'। अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने इसे बाजार के जरिए काम करने वाला 'अदृश्य हाथ' कहा। इसका आशय है कि एक मुक्त समाज समस्याओं के समाधान व सवालों के जवाब खोजने में महती भूमिका निभाता है क्योंकि बौद्धिक शक्ति जितनी ज्यादा, उतनी ही बेहतर। दूसरा सिद्धांत यह है कि जब कोई सरकार अच्छे सुझाव पर अमल कर उसे प्रोत्साहित कर सकती है तो निश्चित रूप से यह किसी बुरे सुझाव के साथ भी ऐसा कर सकती है, लेकिन इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं।

इन दोनों ही सिद्धांतों पर चीन से ज्यादा किसी भी देश ने अमल नहीं किया। मानव पूंजी की सबसे अधिक आपूर्ति के बावजूद सत्तारूढ़़ कम्युनिस्ट पार्टी सारे निर्णय खुद करती है। संभव है चीन सरकार ने पार्टी के कुछ अच्छे फैसले लागू किए, पर भयावह नतीजों वाले कई गलत फैसले बार-बार पार्टी से उभरे। साठ साल पहले चीन, विश्व इतिहास के सबसे ज्यादा घातक सूखे की चपेट में था। कारण मौसम या बीमारी नहीं, बल्कि ताकतवर एकदलीय राष्ट्र की खराब नीतियां थीं। फ्रैंक डिकोटर के अनुसार, कम्युनिस्ट नेता माओ से-तुंग ने तथाकथित 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' के जरिए चीन में कृषि को सामूहिक बनाने व उसका औद्योगिकीकरण करने की कोशिश की, पर 1962 में योजना बंद किए जाने तक करीब 4.5 करोड़ लोग भुखमरी और हत्याओं के कारण मारे जा चुके थे।

माओ और केंद्रीय समिति ने इस आपदा से भी गलत सबक लिए, और बेहतर फैसलों के लिए समाज के उदारीकरण की बजाय पर सरकार की पकड़ और मजबूत करने का रास्ता चुना। इसका नतीजा दस साल चली चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के रूप में सामने आया। यह क्रांति 1976 में माओ से-तुंग की मृत्यु से पहले शायद 80 लाख और लोगों की मौत का सबब बनी, जब क्रांति का काल समाप्त हो गया। उसके बाद पार्टी की केंद्रीय समिति ने परिवार नियोजन की नीति अपनाने का निर्णय किया। 1980 में 'एक बच्चा' अध्यादेश लाया गया। नतीजा, आज चीन घटती जनसंख्या की समस्या का सामना कर रहा है, जबकि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर चीन अब भी गरीब देश है जो कम होती युवा पीढ़ी के दम पर बढ़ते पेंशनरों को सहारा देने के लिए मजबूर है।

विशेषज्ञों ने सालों पहले ही चीन की एक बच्चा नीति के आत्मघाती परिणामों की आशंका जता दी थी। 2016 में हालांकि इस सिद्धांत को चीन में निष्प्रभावी कर दिया गया था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गिरती जन्म दर को देखते हुए पिछले माह ही एक और विफल नीति के असर को कम करने के लिए केंद्रीय समिति ने तीन बच्चों की नीति का समर्थन किया। चीन में अकाल की त्रासदी के बाद से लेकर अब तक के वर्षों की तुलना में गत वर्ष पैदा हुए बच्चों की संख्या सबसे कम रही। जाहिर है कि वयस्क महिलाएं अब सरकार की नीतियों में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहीं।

एक बच्चा नीति का दुखद पहलू यह रहा कि कई वयस्क महिलाएं खुद को उस संस्कृति में अनचाहा महसूस करती हैं, जिसमें गर्भपात और लड़के की चाह रखने वाले परिवारों में कन्याओं का गर्भपात आम बात हो गई। कई को अब फिर से गरीबी का डर सताता है, क्योंकि संतान सुख महंगा हो गया है और हाल की आर्थिक वृद्धि के बावजूद प्रति व्यक्ति आय पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया की आधी से भी कम है। गिरती जनसंख्या चीन ही नहीं, कुछ अन्य देशों की भी समस्या है। घटती आबादी के साथ आर्थिक प्रगति को ठहरने न देना 21वीं सदी के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती होगी। चीन सीमित सरकार और मुक्त समाज का महत्त्व समझेगा, यह मुश्किल लगता है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग केवल अपनी स्थिति को मजबूत बनाने पर तुले हैं। कुछ लोग सुधरना ही नहीं चाहते।