नया सहकारिता मंत्रालय और महत्त्वाकांक्षाएं व चिंताएं

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Published: 22 Jul 2021, 08:22 AM IST

ऐसा नहीं कि निजी निवेश बुरा है लेकिन को-ऑपरेटिव्स को कमजोर करने और खत्म करने का खेल नहीं खेला जाए, यह भी देखना होगा।
सरकार की मंशा चाहे जो हो, नीतिगत विषयों पर बहस होनी चाहिए।

प्रो. एम.एस. श्रीराम, (सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी, आइआइएम-बी)

मोदी सरकार के केबिनेट विस्तार से एक दिन पहले नए सहकारिता मंत्रालय के गठन की घोषणा की गई। सामान्यत: यह प्रशासनिक अमले के पुनर्गठन का ही एक अंग माना जाता, लेकिन सहकारिता मंत्री के नाम की घोषणा के साथ ही बहस छिड़ गई। कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं, जिनका नाम जुडऩे मात्र से छोटे से कार्य का महत्त्व बढ़ जाता है। संविधान के अनुसार, सहकारी संघ राज्य का विषय है। केवल बहुराज्ययी सहकारी संघ ही केंद्र की सूची में आते हैं। इस उच्च स्तरीय नियुक्ति के साथ ही कई लोगों की भृकुटियां तन गईं। भारत में सहकारिता तंत्र को चार भागों में बांटा जा सकता है और अगर हम इनका अध्ययन करेंगे तो कुछ मुद्दे सामने आएंगे।

पहला, पिछले कुछ सालों से ग्रामीण सहकारिता क्रेडिट व्यवस्था का महत्त्व घटा है। इसे प्रोत्साहित करने का अंतिम प्रयास करीब 15 साल पहले किया गया था, जब केंद्र ने वैद्यनाथन समिति गठित कर उसकी सिफारिशें स्वीकार की थीं। तब से कोई नीतिगत पहल नहीं की गई है, सिवाय इसके कि केरल ने उच्च वर्गीय को-ऑपरेटिव्स को एकीकृत कर केरल बैंक से जोड़ा और रिजर्व बैंक ने अन्य राज्यों को भी केरल मॉडल का अनुकरण करने के दिशा-निर्देश हाल ही जारी किए। संविधान के 97वें संशोधन के तहत सहकारी संघों की भूमिका बढ़ाई गई और नियमन के नाम पर संस्थानों पर सीधे कब्जा जमाने के मुद्दे का समाधान किया गया। परन्तु फिलहाल इस क्षेत्र में नए मंत्री के लिए कार्य करने की गुंजाइश काफी कम है। दूसरा अहम क्षेत्र है, अरबन को-ऑपरेटिव बैंक। बैंकिंग नियमन अधिनियम में हाल ही किए गए संशोधन और नियमन संदर्भ में बढ़ाई गई आरबीआइ की भूमिका के चलते केंद्र सरकार प्रत्यक्षत: काफी कम काम कर पाएगी। तीसरा क्षेत्र है माल सहकारिता का, जहां कार्य की गुंजाइश है। इसका कृषि से गहरा ताल्लुक है। ऐसे सहकारी संघों की सूची बनाई जा सकती है, जो कोको, सुपारी, तिलहन, हैंडलूम व कृषि उत्पादों के क्षेत्र में कार्य कर रहे हों, लेकिन दो विशिष्ट क्षेत्र हैं - चीनी (महाराष्ट्र) और दूध (गुजरात, कर्नाटक)। चौथा क्षेत्र है किसान उत्पादक संघ (एफपीओ)। कंपनी अधिनियम के तहत आने वाले इन संघों को राज्य से केंद्र के अधीन कर दिया गया है। हाल ही गृह, स्वास्थ्य देखभाल, कृषि और शिक्षा के केंद्रीकरण को लेकर जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए राज्यांतर्गत विषयों के अधिकाधिक केंद्रीकरण के संदर्भ में एफपीओ का विषय केंद्र के अधीन लाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।

इससे अमूल जैसे संगठनों का केंद्रीकरण हो सकता है, जो कि गुजरात स्थित को-ऑपरेटिव है और समूची मूल्य शृंखला में राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति रखता है। चीनी के संदर्भ में भी ऐसा ही हो सकता है। राष्ट्रीयकरण और केंद्रीकरण के इस तरीके का विरोध होना चाहिए।

वित्त मंत्री ने सोशल स्टॉक एक्सचेंज बनाने की घोषणा की है। दो समितियों को यह कार्यभार सौंपा गया है कि उसका संचालन कैसे होगा। यह दक्षता और तकनीक के नाम पर को-ऑपरेटिव्स में निजी निवेश आकर्षित करने का प्लेटफॉर्म साबित होगा। यह काफी कुछ वैसा ही है, जैसे कृषि क्षेत्र को निजी बाजार की ओर धकेला जा रहा है। ऐसा नहीं है कि निजी निवेश बुरा है, लेकिन पिछले दरवाजे से अधिग्रहण के रास्ते खोल को-ऑपरेटिव्स को कमजोर करने और खत्म करने का खेल नहीं खेला जाए, यह भी देखा जाना चाहिए। विफल होते बाजार में को-ऑपरेटिव्स ने सदा ही मोलभाव का मौका दिया है। नया मंत्रालय महत्त्वाकांक्षाओं से अधिक चिंता का सबब बन रहा है। सरकार की मंशा चाहे जो हो, विचारधारा और नीतिगत विषयों पर बहस होनी चाहिए, बजाय पहचान, जनसंख्या नियंत्रण, मंदिर और धर्म के। जरूरत है कि आर्थिक मुद्दों और आर्थिक शासन संचालन के नजरिए पर स्वस्थ बहस के लिहाज से ही सही, लेकिन बहस का स्वागत किया जाए।