साहसिक फैसला

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Published: 27 Nov 2015, 12:05 AM IST

बिहार को न केवल गुजरात बनने से बचना होगा बल्कि शराबबंदी के लिए मॉडल भी प्रस्तुत करना होगा। इस सबके बीच सरकार और समाज, दोनों को मिलकर दीर्घकाल के लिए रास्ता भी निकालना होगा
अपने चुनावी वादे के अनुरूप बिहार में शराबबंदी का ऐलान करके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साहसिक काम किया है। बिहार न तो विकसित राज्यों की श्रेणी में है और न उसके पास कमाई के इतने अवसर कि इतना बड़ा फैसला एक झटके में ले सके। बावजूद इसके आबकारी से सालाना 4 हजार करोड़ रु. वसूली का मोह छोड़कर नीतीश ने ये संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार होती तो आखिर जनता के लिए ही है।

जनहित में 4 हजार करोड़ रुपए की कमाई मायने नहीं रखती। देश के अलग-अलग राज्यों में शराब जैसी सामाजिक कुरीति पर रोक लगाने की मांग उठती रहती है। कहीं अहिंसक तो कहीं हिंसक आंदोलन होते हैं। ताजा उदाहरण राजस्थान का है जहां शराबबंदी की मांग को लेकर अनशन कर रहे पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा को जान तक गंवानी पड़ी। दूसरे राज्यों में भी ऐसे अनशन-सत्याग्रह देखने को मिलते रहते हैं।

छाबड़ा जैसा सामाजिक कार्यकर्ता अनशन करते-करते अपने प्राण गवां बैठा लेकिन समाज में वह हलचल देखने को नहीं मिली, जिसकी अपेक्षा की जाती है। न राज्य सरकार की ओर से ना ही समाज और सामाजिक संगठनों की तरफ से। इसमें कोई दो राय नहीं कि, शराब घर-परिवार को खूब नुकसान पहुंचाती है। पीने वाले का शरीर और परिवार का पैसे से लेकर सुख चैन तक सब फुंक-लुट जाता है।

दूसरा सच यह भी है कि, यह आज राज्यों की कमाई का बड़ा जरिया बन गया है। राजस्थान जैसे अनेक राज्य जहां पर्यटन बड़ा व्यवसाय है, शराब एक जरूरत सी बन गई है। केरल और गुजरात जैसे राज्य जिन्होंने शराबबंदी लागू कर रखी है, के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां सरकार की रोक के बावजूद हर व्यक्ति को अपनी पसंद की शराब मिल जाती है। इसमें पीने वाले को महंगी मिलती है और सरकार को राजस्व का नुकसान होता है।

फायदा केवल शराब का अवैध कारोबार करने वालों का होता है, जो मनमाफिक कीमत वसूलते हैं। कम से कम भारत में शराब की बिक्री का कोई समर्थन नहीं करेगा लेकिन अगर बंदी होने पर भी वह मिलती रहे तो उसका क्या लाभ? बिहार को इस बारे में न केवल गुजरात बनने से बचना होगा बल्कि शराबबंदी चाहने वालों के लिए एक मॉडल भी प्रस्तुत करना होगा। इस सबके बीच सरकार और समाज, दोनों को मिलकर दीर्घकाल के लिए ऐसा रास्ता भी निकालना होगा जो समाज और सरकार दोनों की ही समस्या का समाधान करे। स्कूल, अस्पताल और बाजारों में शराब की बिक्री तो किसी भी सूरत में जायज नहीं है।

दु:ख इस बात का है कि, सरकार खुद ही समाज को शराब के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए नियम बनाती है और फिर खुद ही उनकी धज्जियां उड़वाती है। ऐसे माहौल में ही समाज में इसके खिलाफ आवाज उठती है जो सरकारों को हिला कर रख देती है।