उम्मीद 2021 - साफ मन से खिलेगी आबोहवा

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Published: 28 Dec 2020, 11:47 AM IST

- खेती में हमारी प्राथमिकता अब पैदावार बढ़ाना नहीं बल्कि यह हो कि उसे कितना पौष्टिक और सेहतमंद बना सकते हैं।

- आप घर में पानी और हवा के प्यूरीफायर लगा कर निश्चिंत नहीं हो सकते। पर्यावरण बर्बाद होगा तो भुगतना सभी को पड़ेगा। चाहे वह अमीर हो या गरीब।

भूले तो नहीं हैं आप! मोटर गाडिय़ों की रेलम-पेल वाले इलाकों में भी चिडिय़ों की चूं-चूं सुनाई दे रही थी। नदियों का पानी साफ था, आसमान बिल्कुल नीला... पहाड़ दूर से ही दिखने लगे थे...कितनी अच्छी हो गई थी आबो-हवा। लेकिन इसकी कीमत क्या देनी पड़ी? लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों की रोजी छीन ली, उन्हें बेघर कर दिया। हमें चिडिय़ों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी, उन्हें बच्चों का रोना।

यानी, हमें हवा-पानी साफ तो करना है, लेकिन बड़ी सोच के साथ। छोटे-मोटे कदमों से हम अपने आप को बहलाते रहेंगे। कभी कुछ साफ बसें उतार दीं, चंद सड़कों पर साइकिल लेन बना दी, एक-दो प्रदूषण वाले उद्योगों को बंद कर दिया.. इतने से कुछ नहीं होगा। नए साल में हमें कोयले जैसे अपने ईंधन को बदलना होगा। प्राइवेट गाडिय़ों की संख्या काबू करें।

सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देना होगा। सारे संसाधन महानगरों में केंद्रित नहीं करें। विकास और खेती को सस्टेनेबल या संवहनीय बनाएं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे सभी संस्थानों को मजबूत करना होगा। राजस्थान ने शुरू से पानी को सहेजने का तरीका दिया है। लेकिन रामगढ़ जैसे जीवनदायी जलस्रोत सूख रहे हैं। यह बहुत बड़ा सवाल है। आने वाले वर्ष में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) भी इस पर ज्यादा काम करेगा। इसके लिए आगोर या कैचमेंट एरिया को बचा कर रखना होगा।

पराली जलाने के विकल्प देने होंगे -
शहरों में पानी सरकार हमारे घर तक पहुंचाती है, लेकिन किसान को पानी खुद निकालना होता है। पराली जलाने के लिए आप क्या पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों को जेल में डालेंगे? उन्हें संसाधन देने होंगे, सशक्त करना होगा। कारखाने इतना प्रदूषण फैलाते हैं, कारों से इतना प्रदूषण होता है, इन्हें क्यों नहीं बंद कर दिया जाता?