एक्सपर्ट व्यू - युवा प्रेरित होंगे तो ही समाज आगे बढ़ेगा तभी कुछ सुधरेगा

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Published: 31 Dec 2020, 09:02 PM IST

- महामारी के बाद का समय दुनिया को एक बराबरी का मैदान बनाने का मौका है

सद्गुरु जग्गी वासुदेवन एक आधुनिक गुरु हैं। विश्व शांति और खुशहाली की दिशा में निरंतर काम कर रहे सद्गुरु के रूपांतरणकारी कार्यक्रमों से लोगों को एक नई दिशा मिली है। 2017 में भारत सरकार ने सद्गुरु को उनके अनूठे और विशिष्ट कार्यों के लिए पद्मविभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

सन् 2020 हम में से कई लोगों के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण समय रहा है। हर एक ने कोई न कोई कीमत चुकाई है। साथ ही, भारत अपनी एक विशाल युवा आबादी के साथ एक जबरदस्त संभावना की कगार पर खड़ा है। युवा का अर्थ है कि मानवता निमित्त हो रही है। उनमें बड़े लोगों जितनी अकड़ नहीं है, तो दुनिया में एक नई संभावना पैदा करने के लिए उनके लिए अब भी मौका है। अगर दुनिया में कुछ रचनात्मक होना है तो वह युवा के द्वारा ही होगा। कुछ विनाशकारी होना है तो वह भी युवा से ही होगा।

आम तौर पर, युवा की प्रकृति ऐसी है कि उनकी ऊर्जा ऊंची है, और वे प्रतिक्रियावादी भी हैं। अगर वे ऊर्जा की एक खास उदासीन अवस्था में हैं, तो प्रेरणा और उचित मार्गदर्शन के बिना, वे बड़ी आसानी से नकारात्मक बन सकते हैं। अगर उनमें जरूरी संतुलन है तो वे अपनी ऊर्जा को एक सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। युवाओं के बीच प्रेरणा का जबरदस्त अभाव। बिना प्रेरणा के, कोई भी इंसान उन सीमाओं से ऊपर नहीं उठ सकता, जिनमें वह रहता है। चाहे वो शारीरिक हो, मानसिक हो, या सामाजिक हो। जब हम प्रेरित होते हैं, सिर्फ तभी हम उससे आगे जाकर चीजें करते हैं, जो इंसान सामान्य रूप से करते हैं।

उदाहरण के लिए, आजादी की लड़ाई के दौरान, हमारे पास एक प्रेरित आबादी थी। लोग हर जगह से बाहर निकलकर देश के लिए अपने जीवन को सड़कों पर झोंक देने को तैयार थे लेकिन पचास साल के दौर में, हमने लोगों को प्रेरित करने के लिए कुछ नहीं किया है। अब बहुत सारे चिड़चिड़े और गुमराह लोग मौजूद हैं। जिस तरह से हम अपने युवाओं को सूचनात्मक ज्ञान प्रदान करने में अपना समय, संसाधन और ऊर्जा लगा रहे हैं, वैसे ही हमें प्रेरित करने में भी लगाना होगा। सिर्फ तभी, समाज आगे बढ़ता है और कुछ लाभदायक करता है।

युवा को प्रेरित बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मानवता के साथ उनकी पहचान बस खुद उन तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। दुनिया में हर इंसान मानव कल्याण के बारे में अलग-अलग स्तर तक चिंतित है। एक व्यक्ति की मानवता की सोच बस वह खुद है, एक दूसरे व्यक्ति सोच में वह खुद और उसका परिवार है। यह महत्वपूर्ण है कि मानवता की अपनी सोच में युवाओं को विस्तृत समाज और अपने आस-पास की दुनिया को शामिल करना चाहिए। दुर्भाग्य से यह आधुनिक शिक्षा में नहीं है, जिसकी वजह से यह लोगों को सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए लगातार प्रशिक्षित कर रही है। यह हर चीज को अपने आराम और खुशहाली के लिए इस्तेमाल करने के बारे में है। शुरुआत में हम धरती को, पेड़-पौधों को, जानवरों को इस्तेमाल करते हैं, और तब बेशक, इंसानों को भी। शोषण का यह नजरिया हमारी औपचारिक शिक्षा के माध्यम से गहरा बैठा दिया गया है। हमें जिसकी तुरंत आवश्यकता है वो है, एक अधिक समावेशी दुनिया और अर्थव्यवस्था और सबसे बढ़कर, सर्वसमावेशी चेतना। योग और आध्यात्मिक प्रक्रिया का महत्व यह है कि वह इस समावेशी भावना को लाती है। योग का चरम लक्ष्य एक ऐसी अवस्था में आना है जहां आप पूरे अस्तित्व को अपने एक हिस्से के रूप में अनुभव करते हैं।

इंसान चाहे जिस भी विचारधारा का हो, चाहे जो भी जाति, पंथ, या धर्म का हो। यही समय है कि हर कोई यह देखे कि वह कैसे देश की समस्याओं के लिए समाधान हो सकता है। यह देखिए कि कैसे आपके धर्म और संस्कृति समाधान हो सकते हैं। अपनी श्रद्धा को भीतर एक निजी तलाश होने दीजिए। अपनी जाति को देश की संस्कृति की विविधता की बस चित्रकारी जैसी रहने दीजिए। आइए हम विचारधाराओं, श्रद्धा, जाति-पंथ को खुद के टुकड़े करने के लिए विभाजनकारी ताकत की तरह इस्तेमाल न करें।

अपनी सोच को देना होगा विस्तार -
दुनिया में हर इंसान मानव कल्याण के बारे में अलग-अलग स्तर तक चिंतित है। एक व्यक्ति की मानवता की सोच बस वह खुद है। वहीं, एक दूसरे व्यक्ति की सोच में वह खुद और उसका परिवार है। यह महत्वपूर्ण है कि मानवता की अपनी सोच में युवाओं को विस्तृत समाज और अपने आस-पास की दुनिया को भी शामिल करना चाहिए।