मंद पड़ रही चाक की रफ्तार, दीपक निर्माण पर पड़ी मार

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Updated: 27 Oct 2020, 11:09 AM IST

महंगी हो रही बिजली और समुचित दाम नहीं मिलने से कुंभकारों का धंधा चौपट, दीपावली से कई दिन पहले ही काम में जुट जाते हैं, लेकिन मेहनताना कम मिलने से मायूसी

जीतेश रावल
नागौर. दीपावली पर माटी के दीयों की खासी मांग रहती है और कुंभकार कई दिन पहले से ही इनके निर्माण में जुट जाते हैं। लेकिन, मेहनत के मुकाबले दाम नहीं मिलने से कुंभकार परेशानी उठा रहे हैं। दिनोंदिन महंगी हो रही बिजली और काम के अनुरूप दाम नहीं मिलने की मायूस है। ऐसे में कुंभकारों का यह परम्परागत धंधा चौपट होता जा रहा है। कुंभकार बताते हैं कि दीयों की मांग अच्छी रहती है, लेकिन बड़े व्यापारी औने-पौने दामों पर ही खरीद कर ले जाते हैं। बाजार में इनके दाम ज्यादा आते हैं पर स्वस्तर से बाजार तक पूरा माल ले जाना उनके बस का नहीं है। लिहाजा व्यापारी फायदा उठाते है। उनका मानना हैं कि सरकारी स्तर पर कोई सहयोग मिले तो कुंभकारों को लाभ मिल सकता है।

... ताकि परम्परागत धंधा चलता रहे
फिलवक्त दो जून की रोटी कमाने की आस में त्योहारी सीजन में दीपक बनाने का काम शुरू हो चुका है। कई घरों में अलसुबह से ही दीपक बनने लगते हैं। कुंभकारों के साथ ही उनकी संतान भी सहयोग करते हैं। थोड़े-बहुत सहयोग के साथ ही दीपक बनाने का प्रशिक्षण भी मिलता जाता है, ताकि परपम्परागत धंधा आगे भी चलता रहे।

व्यापारी की झोली में जाता मुनाफा
नागौर शहर से सटे चेनार गांव में कुंभकारों के कई घर हैं, जहां मिटटी के दीपक, मटकियां, सिकोरा, करवा आदि बनाए जाते हैं। इनकी दूर-दूर तक मांग रहती है, लेकिन मेहनत के अनुरूप दाम नहीं मिल रहे। कुंभकार अपने माल को व्यापारी के जरिए बेचते हैं। इससे बाजार से मिलने वाला मुनाफा व्यापारी की झोली में जाता है।

सहायता मिले तो संवर सकते हैं
कुंभकार दयाराम प्रजापत ने बताया कि लॉक डाउन के बाद से स्थिति काफी खराब है। बिजली महंगी होने से चाक चलाना मुश्किल हो रहा है। गांवों में नाड़ी-तालाब खुदाई का विरोध होता है, जिससे माटी भी मुश्किल मिलती है। राधाकिशन ने बताया कि वे मटकियां, करवा, सिकोरा, दीया सब बनाते हैं, लेकिन व्यापार ही नहीं हो रहा। खर्चा ज्यादा है और मेहनताना कम है। व्यापारी लोग सारा माल ले जाते हैं, लेकिन मेहनताना ज्यादा नहीं मिल रहा। प्रेमसुख प्रजापत ने बताया कि हिसाब लगाया जाए तो पूरी मजदूरी तक नहीं मिल रही। व्यापारी कोई भाव नहीं दे रहे हैं, लेकिन परम्परागत धंधा होने से इसे छोड़ भी नहीं सकते। इन सभी का कहना था कि सरकारी स्तर पर कोई सहायता मिले तो पारम्परिक धंधा व उनका जीवन दोनों संवर सकते हैं।