चकौड़ा के पौधों में लगी विचित्र बीमारी

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Updated: 29 Jul 2021, 10:03 PM IST

जांच के लिए जबलपुर भेजे गए नमूने, कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक दल ने किया निरीक्षण

मंडला. कृषि विज्ञान केन्द्र मंडला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुुख डा विषाल मेश्राम को दूरभाष के माध्यम जानकारी प्राप्त हुई कि जिले के नैनपुर विकासखंड के तालाब टोला क्षेत्र में लगे चकौड़ो के पौधो में विचित्र बीमारी दिखाई दे रही है। जिसमें इसकी पत्तियों के निचले हिस्सों में कालापन दिखाई दे रहा है। जानकारी दूरभाष के माध्यम से विकास प्रेरक एवं पर्यावरणविद् भास्कर रमन द्वारा प्रदाय की गई इस संबंध में त्वारित कार्यवाही करते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र मंडला के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ विशाल मेश्राम द्वारा केन्द्र में पदस्थ वैज्ञानिकों डॉ आरपी अहिरवार, डॉ प्रणय भारती एवं नीलकमल पन्द्रे की संयुक्त टीम बनाकर तत्काल क्षेत्र का भ्रमण किया गया और आसपास के ग्रामीण, स्थाई निवासी लोगो से चर्चा की। स्थाई ग्रामीणों ने बताया कि इस तरह चकौड़े में जीवन में पहली बार ऐसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं जो अनायास ही लोगो की चिंता का विषय बन गया है। वर्तमान में कोरोना महामारी से गुजरने के बाद ब्लेक फंगस द्वारा उत्पन्न होने वाले गंभीर परिणामों के मद्देनजर रखते हुये लोगो का कयास है कि कहीं इनकी पत्तियों का कालापन भविष्य में मनुष्यों, पशुओं तथा वनस्पतियों एवं पर्यावरण में भी किसी प्रकार की बीमारी का पर्याय तो नहीं होगा। लोगो के विभिन्न प्रकार के कौतूहलों को विराम देने के लिए केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा चकौड़े के पौधे के सजीव नमूने एकत्रित किए गए हैं। जिन्हें जांच हेतू जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय जबलपुर के पौध कार्यिकी विभाग, पौध रोग विभाग एवं कीट रोग विभाग भेजा जाएगा जिससे इसकी वास्तविकता ज्ञात हो सके।


जिले में दूसरे प्रदेश में होता विक्रय
डॉ विशाल मेश्राम ने बताया कि चकोड़ा जिले के जंगलो, सड़क किनारे, मैदानों में वर्षा ऋतु में यह पौधा निकल आता है। ग्रामीण शुरूआत में इसकी भाजी खाते हैं और उनका मानना है कि भाजी के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वर्षा काल में होने वाली बुखार जैसी बीमारियों से रक्षा होती है जब इस पौधे में फल्लियां आती है और बीज पक जाते हैं तब इसके बीज की चाय बनाकर पीते हैं वहीं इन बीजो को गर्म तेल में डाल कर ठंडा किया जाता है तो वह तेल औषधिय गुणों से भरपूर हो जाता है जो खाज-खुजली के लिए भी बहुत उपयोगी होता हैं। जिले से इसके बीज छत्तीसगढ़ एवं देश के अन्य राज्यो तथा विदेशों जैसे चीन, जापान मे भी विक्रय के लिए भिजवाया जाता रहा है। इसकी बाजार मूल्य 10 रुपए से 50 रूपये तक होने से खेती के अतिरिक्त आय का अच्छा विकल्प रहा है।