गोरखगिरि की चोटी पर दी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि, बुंदेली वीरांगना ने बढ़ाया बुंदेलखंड का मान

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Published: 18 Jun 2020, 03:36 PM IST

बुंदेली समाज के सदस्यों ने बुंदेलखंड का मान बढ़ाने वाली महारानी लक्ष्मीबाई की 162वीं पुण्यतिथि पर दी श्रद्धांजलि

महोबा. अपनी वीरता के लिए दुनिया भर में बुंदेलखंड का मान बढ़ाने वाली महारानी लक्ष्मीबाई की 162वीं पुण्यतिथि पर आज बुंदेली समाज के सदस्यों ने गोरखगिरि की चोटी पर पहुंचकर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की और उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर ने कहा कि झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई आज ही के दिन 1858 में ग्वालियर के कोटा की सराय में अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गई थीं। मरते वक्त वे पीठ पर बंधे दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपने विश्वस्त रामचंद्र राव देशमुख को सौंप गई थी जिनको बाद में बहुत मुसीबतें झेलनी पड़ी। वे कई सालों तक दर-दर की ठोकरें खाते रहे। महारानी के घोड़े पवन ने तो वहीं दम तोड़ दिया था लेकिन अंग्रेजों की दहशत की वजह से दामोदर राव व उनके बचे सैनिकों को लोगों ने कहीं कोई शरण नहीं दी। उनको मजबूरन जंगलों में छिपना पड़ा। बाद में सब लोगों को जान बचाने के लिए छद्म रूप धारण करने पड़े। न जाने क्या-क्या कष्ट उठाने पड़े।

इस मौके पर मुन्ना जैन ने बताया कि भीषण आर्थिक तंगी के कारण दामोदर राव को महारानी लक्ष्मीबाई के वे कंगन भी बेचने पड़े जो मरते वक्त वे उनको दे गई थीं। अंग्रेजों के समक्ष समर्पण करना पड़ा। जेल की हवा खानी पड़ी। अंग्रेजी हुकूमत ने बाद में इस शर्त पर पेंशन दी कि वे कभी बगावत नहीं करेंगे। दामोदर राव ज्यादातर समय इंदौर में रहे और 58 वर्ष तक जिए।

ये लोग रहे मौजूद

अच्छे लाल सोनी ने कहा कि आज देश के लिए चीन सबसे बड़ा खतरा बन गया है। हम लोगों को चीनी सामान का बहिष्कार कर अपनी देशभक्ति साबित करना चाहिए। श्रद्धांजलि सभा में प्रवीण चौरसिया, ग्यासी लाल, सिद्धगोपाल सेन, शिवम पुरवार, प्रमोद पचौरी, अवधेश गुप्ता, प्रहलाद, सागर, आयुशी व जान्हवी आदि भी मौजूद रहे।