कभी डकैतों के खौफ के साए में होता था पंचायत चुनाव, डाकू तय करते थे प्रत्याशियों की जीत

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Updated: 27 Mar 2021, 02:00 PM IST

- डकैतों की ओर से चुनावी मैदान में उतारे जाते थे प्रत्याशी

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
जालौन. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है और नामांकन पत्र की बिक्री भी शुरू हो गई है। 15 अप्रैल से मतदान की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। प्रदेश में गांव की संसद का फैसला अब वहां के रहने वाले लोग स्वतंत्र रूप से करते हैं लेकिन अगर दो दशक पुराने चुनावी इतिहास की बात करें तो जानकर आप दंग रह जाएंगे कि यूपी का पंचायत चुनाव कभी डकैतों के खौफ के साए में ही होता था। दस्युओं के खौफ से कोई भी उनके खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। हर चुनाव में डकैतों की ओर से चुनावी मैदान में उतारे गए प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करते थे और सीधे प्रधान और ब्लाक प्रमुख की कुर्सियों पर कब्जा कर लेते थे।

बुंदेलखंड के जालौन जिले में डकैतों और पंचायत चुनाव से जुड़ा ऐसा चुनावी इतिहास है, जिसे जानकर हर कोई दंग रह जाएगा। देश 1947 में ही आजाद हो गया था लेकिन बीहड़ पट्टी से जुड़े गांव 2003 तक डकैतों के खौफ के साये में अपना जीवन व्यतीत करते रहे। यमुना और चंबल के बीहड़ों की पट्टियों से सटे कई गांव, डकैतों की यातनाएं का शिकार भी होते रहे। बीहड़ के डकैतों की कहानियां जितनी खौफनाक हैं, लोगों पर उनका असर भी उतना ही गहरा था। जब 80 के दशक से डकैतों को सियासत का चस्का लगा और इस नशे ने 2003 तक छोटे-बड़े हर चुनाव को प्रभावित किया। जीता वही, जिसके पक्ष में डकैतों ने फरमान जारी किया। फिलहाल वर्तमान में रामपुरा के पचनद के बीहड़ शांत हैं और इसकी वजह यह कि ज्यादातर डकैतों को एनकाउंटर में मार गिराया गया है।

जालौन का बीहड़ में बसा बिलोड़ गांव, आज भी पहलवान उर्फ सलीम नाम के डाकू के सितम की दास्तां बताता है। गांव में एक चबूतरा बना हुआ है, जहां शाम के वक्त डकैत जनसभाएं करने आते थे और यहां कई मामलों पर डाकुओं की निर्णायक मुहर भी लगती थी। पंचायत के कुछ चुनावों में तो ऐसे मौके भी सामने आए कि पर्चा भरने की आखिरी तारीख तक डकैतों के खौफ के कारण एक भी शख्स आगे नहीं आते थे। बाद में डकैतों ने अपने प्रत्याशी का पर्चा भरवाया और उसकी जीत सुनिश्चित कर दी। यहां के रहने वाले लोगों के मुताबिक बीहड़ों में डकैत ही अपनी सरकार चुना करते थे। बीहड़ होने की वजह से इन गांवों में पुलिस की आवाजाही कम होती थीं, जिसका फायदा उठाकर डकैत हर गांव में फरमान देने के लिए शाम के वक्त घोड़े पर सवार अपनी बंदूकों पर पसंदीदा पार्टी के झंडे लगाकर गांव-गांव घूमते थे। यह इस बात का संकेत होता था कि वोट किसे देना है। गांवों में कोई भी इस फरमान के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।

अब अपनी मर्जी से प्रत्याशी चुनते हैं ग्रामीण

बीहड़ के जंगलों में अरविंद गुर्जर, निर्भय गुर्जर, रामवीर, सलीम पहलवान, जगजीवन परिहार, चंदन यादव, रामआसरे उर्फ फक्कड़, कुसुमा नाइन और रेनू यादव के फरमान खूब चले और अपनी जिंदगी की सलामती के लिए हर कोई उनके इस आदेश को मानता था। इतना ही नही जालौन की माधौगढ़ सीट से डकैत रेनू यादव खुद चुनाव लड़ना चाहती थीं। पुलिस की डाकुओं के साथ हुई मुठभेड़ के दौरान कई बार प्रत्याशियों के झंडे और पैंफलेट बरामद किए गए। निर्भय गुर्जर, लालाराम-श्रीराम, फूलन, फक्कड और कुसुमा नाईन आदि ने करीब 25 सालों तक बीहड़ में चुनाव को प्रभावित किया। अब यहां के लोग स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं और अपनी मर्जी से वोट डालकर अपना पसंदीदा प्रत्याशी भी चुनते हैं।