नवरात्रि मनाने की ये है विधि, जिससे होगी आपको वांछित फल की प्राप्ति

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Published: 09 Oct 2020, 01:48 PM IST

देवी मां के इन नौं स्वरुपों का अलग-अलग महत्व...

Navratri Worship method with rules- नवरात्रि की पूजन विधि व दुर्गा सप्तशती की महिमा

नवरात्र में नौ दिनों तक मां के नौ स्वरुपों मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कूष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महगौरी, मां सिद्धिदात्री की पूजा क्रमानुसार की जाती है। मां के ये स्परुप अत्यंत कल्याणकारी और हर विपदा को हरने वाले हैं। मां के इन नौं स्वरुपों का अलग-अलग महत्व है। नवरात्रि के नौ दिनों तक व्रत और पूजन करने वाले साधक का मन हर दिन अलग चक्र में स्थापित होता है। वहीं इस बार 17 अक्टूबर,शनिवार से शारदीय नवरात्रि 2020 शुरु हो रहीं हैं। ऐसे में आज हम आपको नवरात्रि की पूजन विधि व दुर्गा सप्तशती की महिमा के बारे में बता रहे हैं, जिनकी मदद से आप भी वांछित फल प्राप्त कर सकते हैंं।

नवरात्रि में पूजन विधि: pujan vidhi of navratri
नवरात्रि की प्रतिपदा के दिन प्रातः स्नान करके घट स्थापन के बाद संकल्प लेकर दुर्गा की मूर्ति या चित्र की षोडशोपचार या पंचोपचार से गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।

शुद्ध पवित्र आसन ग्रहण कर ऊं दुं दुर्गाये नमः मंत्र का रुद्राक्ष या चंदन की माला से पांच या कम से कम एक माला जप कर अपना मनोरथ निवेदित करें। पूरी नवरात्रि प्रतिदिन जप करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और मनोकामना पूरी होती है।

हर वर्ष में चार नवरात्रों का वर्णन मिलता है - दो गुप्त एवं दो प्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष नवरात्रों में एक को शारदीय व दूसरे को वासन्तिक नवरात्र कहा जाता है। नवरात्र की पूर्व संध्या में साधक को मन में यह संकल्प लेना चाहिए कि मुझे शक्ति की उपासना करनी है। उसे चाहिए कि वह रात्रि में शयन ध्यानपूर्वक करें।

प्रातःकाल उठकर भगवती का स्मरण कर ही नित्य क्रिया प्रारंभ करनी चाहिए। नीतिगत कार्यों से जुड़कर अनीतिगत कार्यों की उपेक्षा करनी चाहिए। आहार सात्विक लेना चाहिए और आचरण पवित्र रखना चाहिए। नवरात्रि में सम्यक् प्रकार से सत्याचरण करते हुए साधक शक्ति का अर्जन कर सकता है।

पूजन मन को एकाग्रचित्त करके करना चाहिए। यदि संभव हो तो नित्य श्रीमद्भागवत, गीता, देवी भागवत आदि ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए, इससे मां दुर्गा की पूजा में मन अच्छी तरह लगेगा। जिनके परिवार में शारीरिक, मानसिक या आर्थिक किसी भी प्रकार की समस्या हो, वे मां दुर्गा से रक्षा की कामना करें। इससे उन्हें चिंता से मुक्ति भी मिलेगी और मन भी उत्साहित रहेगा।

इन बातों का रखें ध्यान : Do and Dont's in Navratri
नवरात्र आराधना के समय कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। इससे मां दुर्गा प्रसन्न होंगी और साधक को वांछित फल की प्राप्ति होगी।

: कई बार ऐसा होता है कि मां दुर्गा की पूजा विधि-विधानपूर्वक करने पर भी वांछित फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। भक्तों को यह ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गा जी की पूजा में दूर्वा, तुलसी, आंवला आक और मदार के फूल अर्पित नहीं करें। लाल रंग के फूलों व रंग का अत्यधिक प्रयोग करें।

: लाल फूल नवरात्र के हर दिन मां दुर्गा को अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार घर में मां दुर्गा की दो या तीन मूर्तियां रखना अशुभ है।

: मां दुर्गा की पूजा सूखे वस्त्र पहनकर ही करनी चाहिए, गीले कपड़े पहनकर नहीं। अक्सर देखने में आता है कि महिलाएं बाल खुले रखकर पूजन करती हैं, जो निषिद्ध है। विशेष कर दुर्गा पूजा या नवरात्रि में हवन, पूजन और जप आदि के समय उन्हें बाल खुले नहीं रखने चाहिए।

ऐसे समझें दुर्गा सप्तशती की महिमा...
मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों की रक्षा के लिए परमगोपनीय, कल्याणकारी देवी कवच के पाठ आर देवी के नौ रूपों की आराधना का विधान बताया है, जिन्हें नव दुर्गा कहा जाता है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक देवी के इन रूपों की साधना उपासना से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि यह कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी है। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी माहात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत् पाठ से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

सर्वकल्याण के लिए...
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।

बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए...
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय।।

आरोग्य व सौभाग्य प्राप्ति के लिए...
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि।।
विघ्ननाशक मंत्र सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम्।।