शारदीय नवरात्रि 2020: नवरात्रियों की नौ देवियां और मंत्र-तंत्र के साथ ही ध्यान चक्र साधना

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Published: 28 Sep 2020, 02:02 PM IST

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Shardiya navratri 2020 starts from 17 October and after durga puja immersion on 26 Oct.- शारदीय नवरात्र में ऐसे पाएं देवी मां से आशीर्वाद

हर साल पितृपक्ष के ठीक बाद शुरु होने वाली शारदीय नवरात्र इस बार पितृपक्ष की समाप्ति के एक माह बाद से शुरु होने जा रही है। वहीं इस बार 17 अक्टूबर से शुरू हो नवरात्र के नवें दिन यानि 25 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। पंडितों व जानकारों के अनुसार शारदीय नवरात्रि माता दुर्गा की आराधना के लिए सबसे श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ये नौ दिन अनादि की आदि ‘ मां ' की पहचान करने के लिए है।

पंडित सुनील शर्मा का कहना है कि नवरात्रि मां दुर्गा को प्रसन्न करने का सबसे खास समय है। इन दिनों में सारे देश में होने वाला प्रेम, करुणा, ममता, वात्सल्य, सृजन और पालन, संरक्षण का मातृरूप अवतरण है। इस दिव्य भावाभिव्यक्ति को प्रकट करना ही नवरात्रि के नौ दिनों में की जाने वाली साधना का सार है। इसी में समाई है मातृत्व की सम्यक् पहचान। नवरात्रि के दिनों में हम अपने संवेदनशून्य मन को देवी मां के प्रेम से संवेदित करें। अपनी मां को सच्ची और सम्यक् प्रतिष्ठा प्रदान करने के अधिकारी बनने का अनुष्ठान करें।"

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2020 में नवरात्र, दशहरा पर्व की तिथियां व मुहूर्त...

—: इस बार नवरात्र पर्व 17 अक्टूबर से शुरू हो रहा हैं और 25 को नवमी तथा विजया दशमी (दशहरा) है।
—: जबकि दुर्गा विसर्जन 26 अक्टूबर, सोमवार को है।

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार इस साल यानि वर्ष 2020 में दशहरा 25 अक्टूबर, रविवार को पड़ रहा है, इसका कारण यह हैं कि...
: दशहरा पर्व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अपराह्न काल में मनाया जाता है। इस काल की अवधि सूर्योदय के बाद दसवें मुहूर्त से लेकर बारहवें मुहूर्त तक की होती।
: यदि दशमी दो दिन के अपराह्न काल में हो तो दशहरा त्यौहार पहले दिन मनाया जाएगा।
: यदि दशमी दोनों दिन पड़ रही है, परंतु अपराह्न काल में नहीं, उस समय में भी यह पर्व पहले दिन ही मनाया जाएगा।
: यदि दशमी दो दिन हो और केवल दूसरे ही दिन अपराह्नकाल को व्याप्त करें, तो विजयादशमी दूसरे दिन मनाई जाएगी।

इसके अलावा श्रवण नक्षत्र भी दशहरा के मुहूर्त को प्रभावित करता है।

: यदि दशमी तिथि दो दिन पड़ती है (चाहे अपराह्ण काल में हो या ना) लेकिन, श्रवण नक्षत्र पहले दिन के अपराह्न काल में पड़े तो विजयदशमी का त्यौहार प्रथम दिन में मनाया जाएगा।
: यदि दशमी तिथि दो दिन पड़ती है (चाहे अपराह्न काल में हो या ना) लेकिन श्रवण नक्षत्र दूसरे दिन के अपराह्न काल में पड़े तो विजयादशमी का त्यौहार दूसरे दिन मनाया जाएगा।
: यदि दशमी तिथि दोनों दिन पड़े, लेकिन अपराह्ण काल केवल पहले दिन हो तो उस स्थिति में दूसरे दिन दशमी तिथि पहले तीन मुहूर्त तक विद्यमान रहेगी और श्रवण नक्षत्र दूसरे दिन के अपराह्न काल में व्याप्त होगा तो दशहरा पर्व दूसरे दिन मनाया जाएगा।
: यदि दशमी तिथि पहले दिन के अपराह्न काल में हो और दूसरे दिन तीन मुहूर्त से कम हो तो उस स्थिति में विजयादशी त्यौहार पहले दिन ही मनाया जाएगा। इसमें फिर श्रवण नक्षत्र की किसी भी परिस्थिति को ख़ारिज कर दिया जाएगा।

ऐसे में इस बार जहां 25 अक्टूबर को नवमी सुबह 7.41 तक ही रहेगी, वहीं इसके बाद दशमी शुरु हो जाएगी। जबकि यह दशमी तिथि 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजे तक ही रहेगी। जिसके चलते दशहरा 2020 यानि विजयदशमी 2020, 25 अक्टूबर को ही मनाया जाएगा। जबकि दुर्गा विसर्जन 26 अक्टूबर को होगा।

—: दिनांक 24 अक्टूबर को सुबह 6 बजकर 58 मिनट तक अष्टमी है और उसके बाद नवमी लग जाएगी। अतः अष्टमी और नवमी की पूजा एक ही दिन होगी।
—: नवमी के दिन 25 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 41 मिनट के बाद दशमी तिथि लग जाएगी। जो यानि दशमी तिथि 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजे तक ही रहेगी।
—: अतः दशहरा पर्व और अपराजिता पूजन एक ही दिन आयोजित होंगे।

देवी भागवत पुराण के अनुसार- इस वर्ष देवी आगमन वाहन है अश्व...
पंडित शर्मा के अनुसार मां दुर्गा का आगमन आने वाले भविष्य की घटनाओं के बारे में हमें संकेत देता है।
—: इस बार देवी का वाहन अश्व है, क्योंकि नवरात्र का आरंभ शनिवार के दिन हो रहा है।
—: देवी भागवत पुराण में इस बात का जिक्र किया गया है कि देवी के आगमन का अलग-अलग वाहन है।
—: माना जाता है कि अगर नवरात्रि की शुरुआत सोमवार या रविवार को हो रही है तो वो हाथी पर आती हैं।
—: अगर शनिवार या फिर मंगलवार को कलश स्थापना हो रही है तो मां घोड़े पर सवार होकर आती है।
—: गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्र का आरंभ होने पर माता डोली पर आती हैं।
—: बुधवार के दिन मां नाव को अपनी सवारी बनाती हैं।
—: वहीं इस बार मां भैंसे पर विदा हो रही है और इसे भी शुभ नहीं माना जाता है।

शारदीय नवरात्रि 2020 : देवी मां का भैंसे पर होगा प्रस्थान, जानिये भैंसे पर वापसी का अर्थ...
एक ओर जहां शारदीय नवरात्रि 2020 में मां दुर्गा का अश्व पर आगमन होगा वहीं देवी मां दुर्गा पूजा के पूरे कार्यक्रम के बाद भैंसे पर प्रस्थान करेंगी। रविवार या सोमवार को देवी भैंसे की सवारी से जाती हैं, ऐसे में जानकारों के अनुसार देवी मां की वापसी का अर्थ कई तरह से समझा जा सकता है।

शशि सूर्य दिने यदि सा विजया महिषागमने रुज शोककरा।
शनि भौमदिने यदि सा विजया चरणायुध यानि करी विकला।।
बुधशुक्र दिने यदि सा विजया गजवाहन गा शुभ वृष्टिकरा।
सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहन गा शुभ सौख्य करा॥

देवा मां का भैंसे पर प्रस्थान के संबंध में मान्यता है कि यह देश में रोग और शोक बढ़ता है। इस लिहाज से माता का आगमन अति शुभ और गमन अशुभ होगा।
नवरात्रि में भैंसे की बलि : मान्यता है कि जिस महिषासुर को देवी दुर्गा ने लड़ाई में मार गिराया, वो भैंसे से दुनिया घूमता था. महिषासुर पर जीत के उपलक्ष्य में कुछ जगहों पर उसकी सवारी की बलि देने की प्रथा है। ज्योतिष में भैंसे को असूर माना गया है, ऐसे में देवी मां का भैंसे पर गमन रोग और शोक के साथ ही कुछ हद तक युद्ध की ओर भी इशारा करता है।

सफलता सिद्ध चमत्कारी देवी मंत्र-
: "ॐ ह्रींग डुंग दुर्गायै नमः ।"
: "ॐ अंग ह्रींग क्लींग चामुण्डायै विच्चे ।
: "सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥"

कामना पूर्ति, विवाह के लिए गौरी मंत्र-
: दुर्गा सप्तशती के अनुसार, मान्यता है कि इन दो मंत्रों में से किसी एक मंत्र का ११०० बार जप अष्टमी तिथि को करने से योग्य जीवन साथी की प्राप्ति होती हैं ।
1- हे गौरी शंकरधंगी, यथा तवं शंकरप्रिया । तथा मां कुरु कल्याणी, कान्तकान्तम् सुदुर्लभं ।।
२- पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।।

धन प्राप्ति मंत्र-
: नौ दिन तक लगातार नौ माला प्रतिदिन। "ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:, स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता ॥"

जाने अंजाने में हुए पापों के दुष्फल से बचने के लिए देवी मंत्र...
मान्यता के अनुसार अष्टमी तिथि को इस मंत्र का एक हजार बार जप करने सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
: "हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव ॥"
: सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
: ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

हर कार्य सफलता देवी आराधना मंत्र-
: या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

सर्व सिद्धि योग नवार्ण मंत्र-
: 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै' । •इस मंत्र में निहित माँ दुर्गा की ये नवों शक्तियां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायक होती हैं।

नवरात्रि में हर दिन का एक अलग रंग तय है...
मान्यता है कि इन रंगों का उपयोग करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
: प्रतिपदा- इस दिन पीले रंग का महत्व होता है। यह रंग साहस का प्रतीक माना जाता है।
: द्वितीया- पृथ्वी पर होने वाली हरियाली मां के इसी रूप के कारण हैं। इसलिए इस दिन हरे रंग का महत्व होता है।
: तृतीया- धूसर (ग्रे) रंग ।
: चतुर्थी- केसरिया रंग।
: पंचमी- सफेद रंग ।
: षष्टी- लाल रंग साहस, शक्ति और कर्म का प्रतीक है।
: सप्तमी- इस दिन का विशेष रंग नीला है जो शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
: अष्टमी- इस दिन गुलाबी रंग का महत्व होता है, जो जीवन में सकारात्मकता का प्रतीक होता है।
: नवमी- बैंगनी, जो सर्व सिद्धि के लिए प्रेरित करता है।

नवरात्रि 2020 : कब करें किस देवी की पूजा और मंत्र-चक्र ध्यान-साधना...
1) दिनांक 17 अक्टूबर-
— मां शैलपुत्री पूजा, घटस्थापना। यह धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष के देने वाली माता हैं। मां पार्वती माता शैलपुत्री का ही रूप हैं और हिमालय राज की पुत्री हैं। माता नंदी की सवारी करती हैं. इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का फूल है।
— मूलाधार में ध्यान कर इनके इस मंत्र को जपते हैं।
—: बीज मंत्र- "ह्रीं शिवायै नम: ।।"
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।'

शैलपुत्री : शिव की पत्नी थीं पार्वती. वो पर्वतराज हिमालय की बेटी थीं. पहाड़ का एक और नाम शैल भी है. उनकी बेटी होने के कारण इन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है.

2) 18 अक्टूबर- मां ब्रह्मचारिणी पूजा, स्वाधिष्ठान चक्र साधना
— माता ब्रह्मचारिणी मां दुर्गा का दूसरा रूप हैं। ये संयम, तप, वैराग्य तथा विजय प्राप्ति की दायिका हैं। जब माता पार्वती अविवाहित थीं तब उनको ब्रह्मचारिणी के रूप में जाना जाता था। वे श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके एक हाथ में कमण्डल और दूसरे हाथ में जपमाला है।
— देवी का स्वरूप अत्यंत तेज और ज्योतिर्मय है।
— जो भक्त माता के इस रूप की आराधना करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
— स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है।
—: बीज मंत्र- "ह्रीं श्री अम्बिकायै नम: ।।"
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।'

ब्रह्मचारिणी : ब्रह्म को अखंड और शाश्वत माना जाता है, जो कभी खत्म न हो. पार्वती ने शिव को पाने के लिए बहुत लंबे समय तक अखंड व्रत रखा था. चारिणी का अर्थ चलने वाली से है. माना जाता है कि लंबे समय तक अखंड व्रत रखने के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है.

3) 19 अक्टूबर- मां चंद्रघंटा पूजा, मणिपुर चक्र ध्यान
— पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि मां पार्वती और भगवान शिव के विवाह के दौरान उनका यह नाम पड़ा था।
— शिव के माथे पर आधा चंद्रमा इस बात का साक्षी है।
— कष्टों से मुक्ति तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए इन्हें भजा जाता है।
— मणिपुर चक्र में इनका ध्यान किया जाता है।
—: बीज मंत्र- "ऐं श्रीं शक्तयै नम: ।।
: मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:।'

चंद्रघंटा : चंद्र का अर्थ चंद्रमा यानी चांद और घंटा का अर्थ चमक होता है. देवी का चेहरा चांद की तरह चमकता है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है.

4) 20 अक्टूबर- मां कुष्मांडा पूजा, अनाहत चक्र साधना
— शास्त्रों में बताया गया है कि माता कुष्माण्डा शेर की सवारी करती हैं और उनकी आठ भुजाएं हैं।
— ये रोग, दोष, शोक की निवृत्ति तथा यश, बल व आयु की दात्री मानी गई हैं।
— अनाहत चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है।
—: बीज मंत्र- "ऐं ह्री देव्यै नम: ।।"
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नम:।'

कूष्माण्डा: कुष का अर्थ होता है पैर और माण्डा का अर्थ होता है पैर. पूरी दुनिया इनके पैरों में मानी जाती है, इसलिए इन्हें कूष्माण्डा कहते हैं.

5) 21 अक्टूबर- मां स्कंदमाता पूजन, विशुद्ध चक्र में ध्यान साधना
— पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है। स्कंद की माता होने के कारण मां का यह नाम पड़ा है। उनकी चार भुजाएं हैं। माता अपने पुत्र को लेकर शेर की सवारी करती है।
— ये सुख-शांति व मोक्ष की दायिनी हैं।
— इनकी आराधना विशुद्ध चक्र में ध्यान कर की जाती है।
—: बीज मंत्र- "ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: ।।"
: मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।'

स्कंदमाता : भगवान कार्तिकेय शिव-पार्वती के बेटे हैं. उनका एक नाम स्कंद भी है. उनकी माता होने के कारण इन्हें ये नाम दिया गया है.


6) 22 अक्टूबर- षष्ठी मां कात्यायनी पूजा, आज्ञा चक्र ध्यान
— मां कात्यायिनी दुर्गा जी का उग्र रूप है जो साहस का प्रतीक हैं। वे शेर पर सवार होती हैं और उनकी चार भुजाएं हैं।
— ये भय, रोग, शोक-संतापों से मुक्ति तथा मोक्ष की दात्री हैं।
— आज्ञा चक्र में ध्यान कर इनकी आराधना की जाती है।
—: बीज मंत्र- 'क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम: ।। '
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम:।'

कात्यायनी : माना जाता है कि देवी पार्वती का जन्म कात्यायन आश्रम में हुआ था. इस वजह से देवी का एक नाम कात्यायनी है.


7) 23 अक्टूबर- उग्र रूप धारी मां कालरात्रि पूजा, आज्ञा चक्र
— पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब मां पार्वती ने शुंभ-निशुंभ नामक दो राक्षसों का वध किया था, तब उनका रंग काला हो गया था।
— मां काली शत्रुओं का नाश, कृत्या बाधा दूर कर साधक को सुख-शांति प्रदान कर मोक्ष देती हैं।
— आज्ञा चक्र (ललाट) पर ध्यान किया जाता है।
—: बीज मंत्र- क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम: ।।
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।'

कालरात्रि : काल को मृत्यु का देवता कहा जाता है, माना जाता है कि इस रात में देवी काल का भी नाश कर सकती हैं, इसलिए इन्हें कालरात्रि कहा जाता है।'

8) 24 अक्टूबर- मां महागौरी दुर्गा पूजा, आज्ञा चक्र (मस्तिष्क) ध्यान
— माता का यह रूप शांति और ज्ञान की देवी का प्रतीक है।
— इनकी साधना से अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
— असंभव से असंभव कार्य पूर्ण होते हैं।
— मस्तिष्क में ध्यान कर इनके इस मंत्र को जपा जाता है।
—: बीज मंत्र- श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।।
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:।'

महागौरी : महा का मतलब होता है ज्यादा और गौरी का मतलब है सफेद या गोरा. देवी का रंग सफेद होने की वजह से इन्हें महागौरी कहा जाता है.

9) 25 अक्टूबर- आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना, सहस्त्रार चक्र ध्यान
— सच्चे मन से माँ की पूजा आराधना करने वाले को हर प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
— मां सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनकी चार भुजाएं हैं।
— सहस्त्रार चक्र (मध्य कपाल) में इनका ध्यान किया जाता है।
—: बीज मंत्र- ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।।
— मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्यै नम:।'

सिद्धिदात्री : सिद्धिदात्री का मतलब है ज्ञान और शक्ति देने वाली. देवी के इस रूप को ज्ञान और शक्ति देने वाला माना जाता है, इसलिए इन्हें सिद्धिदात्री कहते हैं।

वहीं 26 अक्टूबर 2020 को दुर्गा विसर्जन किया जाएगा।

पूजन विधि विधान व सामग्री...
नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री- मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र, लाल चुनरी, आम की पत्तियां, चावल, दुर्गा सप्तशती की किताब, लाल कलावा, गंगा जल, चंदन, नारियल, कपूर, जौ के बीच, मिट्टी का बर्तन, गुलाल, सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची पूजा थाली में जरूर रखें।

पूजन विधि...
: कलश स्‍थापना, देवी के चित्र के साथ संभव हो तो यंत्र प्राण-प्रतिष्ठायुक्त तथा यथाशक्ति पूजन-आरती इत्यादि तथा रुद्राक्ष की माला से जप संकल्प करें।
: जप के पश्चात अपराध क्षमा स्तोत्र तथा अथर्वशीर्ष, देवी सूक्त, रात्र‍ि सूक्त, कवच तथा कुंजिका स्तोत्र का पाठ पहले करें। गणेश पूजन अवश्य करें।
: ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन करने से सिद्धि सुगम हो जाती है।

यह विशेष सामग्री देवी के पास रखें और फिर देखें चमत्कार...!
: बेहद सरल सटीक उपाय नौ दिनों में कभी भी घर पर प्रयोग कर सकते हैं।
: सवा मीटर लाल कपड़ा लें।
: उसमें पांच हल्दी की गांठ रखें।
: पांच सुपारी
: पांच छोटी इलायची
: पांच जोड़े लौंग
: एक मुट्ठी पीले चावल (चावल पर थोड़ी हल्दी डालकर मिला लें)
: श्रद्धानुसार दक्षिणा। ~इस समस्त सामग्री को सवा मीटर लाल कपड़े में बांध लें। देवी भगवती का ध्यान करते हुए संकल्प करें (अपना नाम, अपना गोत्र, अपने माता-पिता का नाम)। प्रार्थना करें कि हे भगवती, आप मेरा...( जो भी इच्छा हो) मनोरथ सिद्ध करो। यह सामग्री आपको अर्पित कर रहा हूं/ कर रही हूं, आप मेरी मनोकामना पूरी करें।


यह विशेष सामग्री देवी के पास रखें और फिर देखें चमत्कार...!
: देवी भगवती की प्रार्थना करते हुए सामग्री मां के चरणों में अर्पित कर दें।
: सामग्री रखने के बाद देवी भगवती को कमल का फूल और अनार अर्पण करें।
: मनोकामना पूरी होने तक सामग्री रखी रहने दें।
: विशेष मनोकामना पूरी हो जाए तो किसी देवी मंदिर में जाकर चढा दें। साल भर यह सामग्री हर संकट से बचाएगी।

देवी दुर्गा यंत्र की विधिवत प्रतिष्ठित कर पूजन करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है। श्री दुर्गा सप्तशती के अध्याय 4, श्लोक 17 के अनुसार यदि दुर्गा यंत्र को सिद्ध कर प्रति दिन पूजा की जाए तो ये उपासक को आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है।

दुर्गा बीसा चमत्कारिक यंत्र, जिसमें स्वयं देवी दुर्गा निवास करती है...
एक त्रिकोण की तरह होता है जिसमें एक केंद्र और उसके आसपास नौ त्रिकोण खाने होते हैं। इनकी जमावट इस तरह होती है कि यह एक त्रिकोण की तरह नजर आता है। इससे अलग-अलग खानों में 1 से 9 तक के अंक लिखे होते हैं और केंद्र में 'दुं" लिखा होता है। यंत्र के तीन ओर 'ॐ दुं दुं दुं दुर्गायै नम:" मंत्र लिखा होता है।

बाज़ार में यह तांबे, अष्टधातु, चांदी, सोना, क्रिस्टल आदि धातुओं से बना हुआ मिलता है। घर में इसे बनाने के लिए भोजपत्र पर अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही से लिखा जाता है। इसके बाद इसका षोडशोपचार पूजन करके दुर्गा सप्तशती के श्लोकों से सिद्ध किया जाता है। 'ॐ दुं दुं दुं दुर्गायै नम:" मंत्र की एक माला से सिद्ध किया जाता है। सिद्ध होने के बाद इसे चांदी के ताबीज में भरकर अपनी दाहिनी भुजा में बांधें या गले में पहनें। इसे चांदी की डिबिया में रखकर तिजोरी में भी रखा जा सकता है।

दुर्गा बीसा चमत्कारिक यंत्र के लाभ
शास्त्रों के अनुसार सिद्ध किया हुआ दुर्गा बीसा यंत्र अपने पास रखने से धन की हानि नहीं होती है। दुर्घटना से बचाव होता है। शत्रुओं का नाश होता है और समस्त प्रकार के बुरे दिनों से रक्षा होती है। नवरात्रि में इस यंत्र की पूजा का विशेष महत्व है। इसे सिद्ध करने के लिए नवरात्रि सबसे अच्छा समय माना गया है।

'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे'- नौ अक्षर नियंत्रित करते हैं नौ ग्रहों को...
इस नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवराात्रि' को। दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरी नवरात्रि को। तीसरा अक्षर 'क्लीं' है, चौथा अक्षर 'चा', पांचवां अक्षर 'मुं', छठा अक्षर 'डा', सातवां अक्षर 'यै', आठवां अक्षर 'वि' तथा नौवा अक्षर "चै" है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करते हैं। इन अक्षरों से संबंधित दुर्गा मां की शक्तियां क्रमशः चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं, जिनकी आराधना क्रमश : तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें नवरात्रि को की जाती है। इस नवार्ण मंत्र के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं और इसकी तीन देवियां महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं।