Parshuram janmotsav 2020 आज: कलिकाल के अंत में फिर उपस्थित होंगे चिरंजीवी भगवान परशुराम! जानें किस किस युग में कहां कहां रहे मौजूद

|

Updated: 26 Apr 2020, 01:18 AM IST

जन्म स्थान, जन्म से जुड़ी कथा,आरती और स्तुति...

Lord Parshuram Jayanti 2020 in India Date- भगवान परशुराम जन्मोत्सव

आज अक्षय तृतीया के दिन 26 अप्रैल 2020 को भगवान परशुराम का जन्मोत्सव है। सनातन धर्म में भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। फरसे के साथ राम के नाम से लोकप्रिय, परशुराम शक्ति, ज्ञान और नैतिकता के प्रतीक हैं।

भगवान परशुराम किसी समाज विशेष के आदर्श ही नहीं है, बल्कि वे संपूर्ण हिन्दू समाज के हैं और उन्हें चिरंजीवी माना जाता है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है।

उन्हें सतयुग में जब एक बार गणेशजी ने परशुराम को शिव दर्शन से रोक लिया तो, रुष्ट परशुराम ने उन पर परशु प्रहार कर दिया, जिससे गणेश का एक दांत टूट गया और वे एकदंत कहलाए।

वहीं भगवान विष्णु के सातवें अवतार राम के काल यानि त्रेता युग में वे सीता स्वयंवर में सामने आए,मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने जब शिव धनुष को तोड़ा तो परशुराम जी महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे, लेकिन जैसे ही उन्हें धनुष टूटने का पता चला तो क्रोध में आ गए।

MUST READ : अक्षय तृतीया 2020 - इस बार ये जरूर करें,जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

लेकिन जब उन्हें प्रभु श्रीराम के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया बाद में श्रीराम ने परशुराम जी को अपना सुदर्शन चक्र भेट किया और बोले द्वापर युग में जब उनका अवतार होगा तब उन्हें इसकी जरूरत होगी।

इसके बाद भगवान विष्णु के आठवें श्रीकृष्ण के काल यानि द्वापर युग में भी उन्हें देखा गया। द्वापर में उन्होंने कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया और इससे पहले उन्होंने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध करवाया था। इसके अलावा द्वापर में ही उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।

मान्यता है कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी और अंतत: वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए थे।

MUST READ : गजकेसरी योग - गुरु के प्रभाव से बना ये योग,जानें कैसे प्रभावित करता है आपकी कुंडली

परशुराम जयंती यानि भगवान परशुराम का जन्मदिन अक्षय तृतीया को आता है, एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे परशुराम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पांचवें पुत्र थे। मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग में हुआ, इसलिए वह तेजस्वी, ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने। वे एक अच्छी तरह से निर्मित काया के साथ, ताकत और अपार शक्ति के ऋषि माने जाते हैं।

अपनी भक्ति और तपस्या (तपस्या) से परशुराम जी ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। जिसके चलते शिव ने उसे अपने शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए एक फरसा दिया। एक महान योद्धा होने के नाते, परशुराम जीवन भर मानवता के अधिकारों के लिए जीते रहे।

मान्यता के अनुसार परशुराम जयंती का दिन इतना पवित्र होता है कि, इस दिन किए गए किसी भी कार्य का फल मिलता है। इसलिए, माना जाता है कि परशुराम जन्मोत्सव यानि अक्षय तृतीया वह दिन है जब आप कोई कार्य, नया उपक्रम या शुभ कार्य कर सकते हैं।

परशुराम का अर्थ...
परशु शब्द का अर्थ है 'कुल्हाड़ी/फरसा' और राम भगवान राम के प्रतीक हैं। इसलिए, इस शब्दों को एक साथ जोड़ने का मतलब है, भगवान राम फरसे के साथ...

कब मनाया जाता है : परशुराम जन्मोत्सव
हिंदू कैलेंडर इस दिन को वैशाख माह के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन यानि अक्षय तृतीया को मनाता है।

भगवान परशुराम के जन्म से जुड़ी कथाएं...
हरिवंश पुराण में दी गई कथा के अनुसार, एक समय 'महिष्मती नगरी ’के नाम से एक शहर था। शहर का शासक कार्तवीर्य अर्जुन था, जो एक क्रूर राजा था। उसकी यातना से परेशान होकर एक बार देवी पृथ्वी भगवान विष्णु से मदद मांगने गईं।

इस पर, भगवान विष्णु ने उन्हें यह कहते हुए सांत्वना दी कि वह महर्षि जमदग्नि के पुत्र के रूप में जन्म लेने के बाद उसके साम्राज्य को समाप्त कर देंगे। उनके शब्दों को ध्यान में रखते हुए, भगवान ने जमदग्नि के घर में जन्म लिया और भगवान परशुराम के रूप में अवतार लेकर उसके साम्राज्य का अंत किया।

MUST READ : लॉकडाउन में आपको भी परेशान कर रही है नकारात्मकता, तो उसे ऐसे करें दूर

वैसे तो भगवान परशुराम के जन्मस्थान को लेकर कई बातें कहीं जाती हैं, लेकिन...

: एक किंवदंती के अनुसार मध्यप्रदेश के इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित यशवंतपुर के आगे जानापाव की पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि का आश्रम था। कहते हैं कि प्राचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं।

पवित्र तीर्थ जानापाव से दो दिशा में नदियां बहतीं हैं। यह नदियां चंबल में होती हुईं यमुना और गंगा से मिलती हैं और बंगाल की खाड़ी में जाता है। कारम में होता हुआ नदियों का पानी नर्मदा में मिलता है। यहां 7 नदियां चोरल, मोरल, कारम, अजनार, गंभीर, चंबल और उतेड़िया नदी मिलती हैं। हर साल यहां कार्तिक और क्वांर के माह में मेला लगता है।

MUST READ : अक्षय तृतीया पर लॉकडाउन पर करें बस ये काम, भरेंगे धन के भंडार

: एक अन्य मान्यता अनुसार उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व दिशा में हजारों साल पुराने मन्दिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली कहा जाता है। महर्षि ऋचीक ने महर्षि अगत्स्य के अनुरोध पर जमदग्नि को महर्षि अगत्स्य के साथ दक्षिण में कोंकण प्रदेश मे धर्म प्रचार का कार्य करने लगे।

कोंकण प्रदेश का राजा जमदग्नि की विद्वता पर इतना मोहित हुआ कि उसने अपनी पुत्री रेणुका का विवाह इनसे कर दिया। इन्ही रेणुका के पांचवें गर्भ से भगवान परशुराम का जन्म हुआ। जमदग्नि ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद धर्म प्रचार का कार्य बन्द कर दिया और राजा गाधि की स्वीकृति लेकर इन्होंने अपना जमदग्नि आश्रम स्थापित किया और अपनी पत्नी रेणुका के साथ वहीं रहने लगे।

राजा गाधि ने वर्तमान जलालाबाद के निकट की भूमि जमदग्नि के आश्रम के लिए चुनी थी। जमदग्नि ने आश्रम के निकट ही रेणुका के लिए कुटी बनवाई थी आज उस कुटी के स्थान पर एक अति प्राचीन मन्दिर बना हुआ है जो आज 'ढकियाइन देवी' के नाम से सुप्रसिद्ध है।

MUST READ : मई 2020 :- इस माह कौन कौन से हैं तीज त्योहार, जानें दिन व शुभ समय

'ढकियाइन' शुद्ध संस्कृत का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है वह देवी जिसका जन्म दक्षिण में हुआ हो। रेणुका कोंकण नरेश की पुत्री थी तथा कोंकण प्रदेश दक्षिण भारत में स्थित है। यह वही पवित्र भूमि है जिस पर भगवान परशुराम पैदा हुए थे।

जलालाबाद से पश्चिम करीब दो किलोमीटर दूर माता रेणुका देवी तथा ऋषि जमदग्नि की मूर्तियों वाला अति प्राचीन मन्दिर इस आश्रम में आज भी मौजूद है तथा पास में ही कई एकड़ मे फैली जमदग्नि नाम की बह रही झील भगवान परशुराम के जन्म इसी स्थान पर होने की प्रामाणिकता को और भी सिद्ध करती है।


: वहीं भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार परशुराम का जन्म वर्तमान बलिया के खैराडीह में हुआ था। उन्होंने अपने शोध और खोज में अभिलेखिय और पुरातात्विक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया हैं। श्रीकौशिकेय अनुसार उत्तर प्रदेश के शासकीय बलिया गजेटियर में इसका चित्र सहित संपूर्ण विवरण मिल जाएगा।

MUST READ : ब्राह्मण- जानें प्याज और लहसुन नहीं खाने के पीछे का कारण

1981 ई. में बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. केके सिन्हा की देखरेख में हुई पुरातात्विक खुदाई में यहां 900 ईसा पूर्व के समृद्ध नगर होने के प्रमाण मिले थे। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर पाण्डुलिपि संरक्षण के जिला समन्वयक श्रीकौशिकेय द्वारा की गई इस ऐतिहासिक खोज से वैदिक ॠषि परशुराम की प्रामाणिकता सिद्ध होने के साथ-साथ इस कालखण्ड के ॠषि-मुनियों वशिष्ठ, विश्वामित्र, पराशर, वेदव्यास के आदि के इतिहास की कड़ियां भी सुगमता से जुड़ जाती है।

भगवान परशुराम की पूजा
इसके तहत इस दिन सुबह स्नान करने के बाद मंदिर और पूजा आसन को शुद्ध करने के बाद भगवान परशुराम जी को पुष्प और जल अर्पित करें और उनका आव्हान करें। मान्यता है कि भगवान परशुराम विष्णु के ऐसे अवतार हैं जो हनुमानजी और अश्वत्थामा की तरह सशरीर पृथ्वी पर उपस्थित हैं।

MUST READ : सप्ताह के दिनों में वार के अनुसार लगाएं माथे का तिलक, मिलेगा शुभ फल

भगवान परशुराम की आरती और स्तुति...
भगवान परशुराम की आरती-

शौर्य तेज बल-बुद्धि धाम की॥

रेणुकासुत जमदग्नि के नंदन। कौशलेश पूजित भृगु चंदन॥
अज अनंत प्रभु पूर्णकाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥


नारायण अवतार सुहावन। प्रगट भए महि भार उतारन॥
क्रोध कुंज भव भय विराम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥

परशु चाप शर कर में राजे। ब्रह्मसूत्र गल माल विराजे॥
मंगलमय शुभ छबि ललाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥

जननी प्रिय पितृ आज्ञाकारी। दुष्ट दलन संतन हितकारी॥
ज्ञान पुंज जग कृत प्रणाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥

परशुराम वल्लभ यश गावे। श्रद्घायुत प्रभु पद शिर नावे॥
छहहिं चरण रति अष्ट याम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥

 

: ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी।


ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी। सुर नर मुनिजन सेवत, श्रीपति अवतारी।। ऊॅं जय।।

जमदग्नी सुत नरसिंह, मां रेणुका जाया। मार्तण्ड भृगु वंशज, त्रिभुवन यश छाया।। ऊॅं जय।।

कांधे सूत्र जनेऊ, गल रुद्राक्ष माला। चरण खड़ाऊँ शोभे, तिलक त्रिपुण्ड भाला।। ऊॅं जय।।

ताम्र श्याम घन केशा, शीश जटा बांधी। सुजन हेतु ऋतु मधुमय, दुष्ट दलन आंधी।। ऊॅं जय।।

मुख रवि तेज विराजत, रक्त वर्ण नैना। दीन-हीन गो विप्रन, रक्षक दिन रैना।। ऊॅं जय।।

कर शोभित बर परशु, निगमागम ज्ञाता। कंध चार-शर वैष्णव, ब्राह्मण कुल त्राता।। ऊॅं जय।।

माता पिता तुम स्वामी, मीत सखा मेरे। मेरी बिरत संभारो, द्वार पड़ा मैं तेरे।। ऊॅं जय।।

अजर-अमर श्री परशुराम की, आरती जो गावे। पूर्णेन्दु शिव साखि, सुख सम्पति पावे।। ऊॅं जय।।

MUST READ : एक मंत्र जो है श्रीकृष्ण लीला का सार, इसका पाठ करने से मिलता है संपूर्ण भागवत का आशीर्वाद

: परशुराम स्तुति

कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः। बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु॥

नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका, नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा।
विप्राणां प्रतिमंदिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नांब्धीनो, स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः॥

पायाद्वो यमदग्निवंश तिलको वीरव्रतालंकृतो, रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः।

येनाशेषहताहिताङरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा, भक्त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता॥

द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनंगदे पीयूषं, सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चस्रो दश॥
एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः , पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः॥

॥ इति श्री परशुराम स्तुति ॥

 

परशुराम जयंती समारोह...
परशुराम जयंती को हिंदू समुदाय द्वारा उत्साह और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन हिंदूओं के लिए प्रमुख दिनों में से एक है और ऐसे में परशुराम जन्मोत्सव के तहत इस दिन निम्नलिखित गतिविधियां की जाती हैं:

: भक्त भगवान परशुराम के सम्मान में परशुराम शोभा यात्रा का आयोजन करते हैं।
: हवन, सत्संग और कथा भी की जाती हैं।
: प्रसाद (पवित्र भोजन) और अन्य खाद्य पदार्थों के साथ लोगों की सेवा के लिए भंडारों का आयोजन भी किया जाता है।
: भगवान परशुराम का सम्मान करने के लिए, कुछ लोगों द्वारा उपवास भी रखा जाता है।
: भगवान विष्णु की भक्ति में देश के कई क्षेत्रों में भक्ति कार्यक्रम देखे जाते हैं।

वहीं इस बार लॉकडाउन के चलते सभी लोग घरों में ही भगवान श्री परशुराम की पूजा कर उनका जन्मोत्सव मनाएंगे।

MUST READ : रामायण के वे दमदार पात्र जो महाभारत काल में भी रहे मौजूद

MUST READ : भगवान शिव से जुड़े हैं कई रहस्य, जानें महादेव से जुड़ी कुछ गुप्त बातें

MUST READ : दुनिया के प्रमुख शिवलिंग, जानिये क्या है इनकी खासियत