China में हजारों बच्चे 'अनाथ' जैसा जीवन जीने पर मजबूर, डिटेंशन कैंपों में माता-पिता कैद

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Updated: 19 Oct 2020, 01:37 AM IST

Highlights

  • हजारों की संख्या में मुस्लिम बच्चों को माता—पिता से अलग कर दिया गया है।
  • चीन शुरू से ही इन कैंपों को व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र का नाम देकर बचता रहा है।

बीजिंग। चीन में हजारों की संख्या में उइगर मुस्लिम परिवारों के बच्चे अनाथ जैसा जीवन जी रहे हैं। उनके माता-पिता को चीन की सरकार ने डिटेशन कैंपों में डाल रखा है। चीन शुरू से ही इन कैंपों को व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र का नाम देकर अपना बचाव करता रहा है। अब शिनजियांग के सरकारी दस्तावेजों से सामने आया है कि हजारों की संख्या में मुस्लिम बच्चों को माता-पिता से अलग कर दिया गया है।

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माता-पिता को चीन की सरकार ने कैद कर लिया है

दक्षिणी शिनजियांग में चीन के सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन करने वाली शोधकर्ता संस्था एड्रियन जेनज का दावा है कि 2018 में यारकंद काउंटी में 9500 से ज्यादा बच्चों को अनाथ का जीवन जीने पर मजबूर किया जा रहा है। वहीं कुछ के माता-पिता को चीन की सरकार ने कैद कर लिया है। वहीं कई ऐसे भी हैं जिनके माता-या पिता में से किसी एक को कैद किया गया है।

सरकारी फाइल से खुली पोल

इन सरकारी फाइलों की जानकारी को ऑनलाइन डाउनलोड किया गया है। इस दस्तावेज में उन बच्चों जानकारी जुटाई गई है, जिनके माता-पिता में से कोई एक या फिर दोनों को डिटेंशन कैंप में रखा गया है। इस सूची में केवल उइगर मुस्लिम समुदाय के बच्चों को शामिल किया गया है। इनमें से एक भी चीन के हान समुदाय का बच्चा नहीं है।

बच्चों के दिमाग पर अभी से नियंत्रण बनाने की कोशिश की जा रही है। रिसर्चर जेनज के अनुसार शिनजियांग में अल्पसंख्यकों को अपने वश में करने की चीन की रणनीति काफी आक्रामक रही है। वे इससे दीर्घकालिक सामाजिक नियंत्रण के तंत्र को बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। ये प्रयास किया जा रहा है कि उनको पहले ही धर्म से अलग कर नियंत्रण में लिया जा सके।

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बच्चों पर चीन रख रहा नजर

इन बच्चों को राज्य अनाथालय या उच्च-सुरक्षा वाले बोर्डिंग स्कूलों में रखा जाता है। इन केंद्रों में बच्चों पर बहुत बारीक नजर रखी जा रही है। हर कक्षा में प्रत्येक बच्चे पर ध्यान दिया जाता है। ये बच्चे मूल उइगर भाषा के बजाय मंडारिन में बातचीत करना सीख रहे हैं। जेनज ने अपने शोध में पाया कि 2019 तक बोर्डिंग सुविधा में रह रहे छात्रों की संख्या 880,500 तक थी। इनमें ऐसे बच्चे भी थे, जिनके माता-पिता किसी अन्य कारण से अलग हो गए थे।