तालिबान को समर्थन देने के बावजूद खुश नहीं है सऊदी अरब, इन मुस्लिम देशों को अफगानिस्तान में देखना भी नहीं चाहता

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Published: 14 Sep 2021, 12:30 PM IST

अफगानिस्तान में तालिबान के नियंत्रण और उसमें कतर की महत्वपूर्ण भूमिका से सऊदी अरब और यूएई दोनों परेशान है। खास तौर पर सऊदी अरब का मानना है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद इस क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़े गंभीर मसले पैदा हो सकते हैं। वहीं, इजराइल को ईरान से खतरा दिखाई पड़ रहा है।

 

नई दिल्ली।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात खाड़ी में ये दो ऐसे देश हैं, जो भारत का भरपूर समर्थन करते हें। इनमें से सऊदी अरब ने अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को अपना समर्थन दिया हुआ है। मगर इससे भारत की चिंता बढ़ी है और इस बात से सऊदी अरब अब खुद परेशान है। संभावना जताई जा रही है कि इस हफ्ते के अंत में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैजल बिन फरहान भारत का दौरा कर सकते हैं।

दरअसल, अफगानिस्तान में तालिबान के नियंत्रण और उसमें कतर की महत्वपूर्ण भूमिका से सऊदी अरब और यूएई दोनों परेशान है। खास तौर पर सऊदी अरब का मानना है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद इस क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़े गंभीर मसले पैदा हो सकते हैं। वहीं, इजराइल को ईरान से खतरा दिखाई पड़ रहा है।

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सऊदी अरब और यूएई अफगानिस्तान में कतर, पाकिस्तान और तुर्की की सक्रिय भूमिका से चिंता में हैं। पाकिस्तान ने अपनी कमर्शियल फ्लाइटों का संचालन काबुल के लिए शुरू भी कर दिया है। काबुल एयरपोर्ट के तकनीकी ऑपरेशन की जिम्मेदारी कतर संभाल रहा है, जबकि तालिबान सरकार ने सुरक्षा का जिम्मा तुर्की को देने की तैयारी की हुई है।

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कतर के विदेश मंत्री अब्दुल रहमान अल थानी और विशेष दूत माजेद अल कुहतानी गत रविवार को काबुल में थे। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अभी तक तालिबान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। वहीं, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तालिबान को सैनिक और राजनीतिक मदद मुहैया करा रही है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए खाड़ी के दोनों देश यानी सऊदी अरब और यूएई चिंतित हैं और भारत के लगातार संपर्क में बने हुए हैं। सऊदी अरब के विदेश मंत्री संभवत: 19 सितंबर को भारत आ सकते हैं।