अलवर से एक कविता रोज: अगर- लेखक जितेंद्र बैरवा, कठूमर

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Published: 18 Sep 2020, 05:04 PM IST

अगर मैं सूरज होता
नहीं तप्ती यह धरती
ना ही इतनी गर्मी पड़ती
अगर मैं चंदा होता
अंधेरी रात का अंधेरा नहीं

अगर मैं सूरज होता
नहीं तप्ती यह धरती
ना ही इतनी गर्मी पड़ती
अगर मैं चंदा होता
अंधेरी रात का अंधेरा नहीं
बस...........................।
चांदनी रात का उजाला होता

अगर मैं वृक्ष होता
पथिक को धूप नहीं
सकल धरा को छाया देता
और ऐसा फल देता
बिना मसाले के अचार का स्वाद देता

अगर मैं बादल होता
सारे जहां की प्यास बुझा
रेगिस्तान को नई राह
हरियालीमय नन्हीं घास देता

अगर मैं पर्वत होता
अपनी ओट में जहां बसा लेता
सारे गमों को आंचल में समा लेता

अगर मैं आंसू होता
आलम के दुखों को एक बूंद में बहा देता

अगर मैं शब्द होता
गाली को प्यार, नरक को स्वर्ग
विष को अमृत, नफरत को मोहब्बत
इस जहां को कश्मीर नाम देता

-जितेंद्र बैरवा, नाटोज, कठूमर

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