बालकों की तुलना में बालिकाओं के किडनी ट्रान्सप्लान्ट के मामले में माता-पिता ज्यादा गंभीर नहीं

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Updated: 22 Jan 2021, 09:01 PM IST

अहमदाबाद के किडनी अस्पताल में किए गए अध्ययन में खुलासा

अहमदाबाद. बच्चों (लड़कों) की तुलना में बच्चियों ( लड़कियों) के किडनी ट्रान्सप्लान्ट के मामले में माता-पिता या अन्य परिजन उतने गंभीर नहीं हैं। एशिया के सबसे बड़े अहमदाबाद के सिविल अस्पताल कैंपस स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजिस एंड रिसर्च सेंटर (आईकेडीआरसी) अर्थात किडनी अस्पताल में किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्पताल में रेनल ट्रान्सप्लान्ट के लिए 35 बच्चे प्रतिक्षा सूची में हैं और उनमें से बालिकाओं की संख्या मात्र छह है।
किडनी अस्पताल के इस अध्ययन में पाया गया है कि लड़कियों के किडनी ट्रन्सप्लान्ट के लिए सरकार उदार है। इसेक बावजूद माता-पिता उनके ट्रान्सप्लान्ट के रजिस्ट्रेशन तक को आगे नहीं आते हैं। इससे यह साबित होता है आज भी अनेक माता-पिता बालिकाओं के इस गंभीर उपचार में उतना महत्व नहीं देते जितना लड़कों को दिया जाता है। इस संस्थान में पिछले 23 वर्षों में मात्र 37 लड़कियों(बालिकाओं) का ही केडेवर दाता के माध्यम से किडनी ट्रान्सप्लान्ट किए गए हैं। वर्ष 1998 के बाद से कुल 518 पीडियाट्रिक रेनल ट्रान्सप्लान्ट किए गए। इनमें से सिर्फ 18 फीसदी ही लड़कियां (बालिका) थीं, शेष 82 फीसदी लड़के (बालक) थे। इतना ही नहीं वर्तमान में जो 35 बच्चे किडनी ट्रांसप्लान्ट के लिए प्रतिक्षा सूची में हैं उनमें से सिर्फ छह लड़कियां हैं। जिन 37 बालिकाओं के किडनी ट्रान्सप्लान्ट किए गए हैं उनमें से चार वर्ष में 20 को केडेवर दानदाता से किडनी मिली हैं।
किडनी अस्पताल की पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. किन्नरी वाला ने बताया कि वयस्क लोगों की तुलना में बच्चों के किडनी ट्रान्सप्लान्ट कम होते हैं। लेकिन जब इनमें लड़कियों के किडनी ट्रान्सप्लान्ट की बात आती है तो यह काफी अलग है। उनका कहना है कि निशुल्क होने के बावजूद भी अभिभावक बालिकाओं के किडनी ट्रान्सप्लान्ट के लिए रजिस्ट्रेशन कराने में पीछे पाए गए हैं। उनके अनुसार सरकार भले ही इस मामले में उदार है लेकिन अभिभावकों की इस मामले में अलग ही सोच है। यही कारण है कि बच्चों की तुलना में बालिकाओं को काफी गंभीर स्थिति से गुजरना पड़ रहा है।

पीडियाट्रिक केडेवर दाताओं की संख्या भी कम
पीडियाट्रिक केडेवर दाताओं की कम संख्या के साथ स्थिति काफी गंभीर है। गुजरात में केडेवर अंग दान में यह मात्र 10 फीसदी ही है। ब्रेन डेड बच्चों के अंगों से उन बच्चों को नया जीवन मिल सकता है जो किडनी, लीवर एवं हृदय जैसे रोगों से गंभीर हैं। शाला आरोग्य प्रोग्राम के अन्तर्गत राज्य सरकार रेनल ट्रान्सप्लान्ट व ऑपरेशन के बाद पूरा खर्च वहन करती है। इसके बावजूद अभिभावक बालिकाओं के किडनी ट्रांसप्लान्ट का रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं जिससे कभी-कभी बालिकाओं को काभी गंभीर स्थितियों से भी गुजरना पड़ता है।
डॉ. विनीत मिश्रा, निदेशक आईकेडीआरसी