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बेटी की मौत के बाद समझौता अशोभनीय

2016-04-28 04:17:23


बेटी की मौत के बाद समझौता अशोभनीय
उदयपुर।ससुराल में प्रिया गुरानी की मौत के बाद दर्ज हुए दहेज हत्या मामले में भारी बवाल मचाने वाले पीहर पक्ष ने ही आठ माह बाद अचानक समझौता कर लिया। इस संबंध में दस्तावेज पेश करते ही न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी कर कहा कि यह परिवादी की इच्छा पर नहीं है कि वह अपनी मर्जी चला ले। पुत्री की मौत के बाद इस तरह से समझौता करना पिता के लिए अशोभनीय है। बहुचर्चित प्रकरण में पीहर पक्ष ने ससुरालजनों पर प्रताडऩा व हत्या के गंभीर आरोप लगाए थे। न्यायालय ने इसमें धारा 304-बी के तहत प्रसंज्ञान भी लिया था। गत 20 अप्रेल को प्रिया के पिता व जवाहरनगर निवासी मोहन गुरानी ने न्यायायल में प्रार्थना पत्र पेश कर बताया कि वे मामले में आगे कार्रवाई नहीं चाहते। उन्होंने समाजिक स्तर पर समझौता कर लिया है। न्यायालय ने प्रार्थना पत्र खारिज कर पत्रावली 25 मई को पेश करने के आदेश दिए।

पिता का कृत्य निदंनीय

विशिष्ट अपर मुख्य न्यायिक मजिस्टे्रट (पीसीपीएनडीटी एक्ट) के पीठासीन अधिकारी समरेन्द्रसिंह सिकरवार ने कड़ी टिप्पणी कर कहा कि प्रकरण में न्यायालय ने धारा 304-बी के तहत प्रसंज्ञान लिया, जो किसी प्रकार से काबिले राजीनामा नहीं है। यह परिवादी की इच्छा पर नहीं है कि वह अपनी मर्जी चलाए। एेसा दृष्टिगत होता है कि परिवादी ने न्यायालय को हथियार (टूल) के रूप में इस्तेमाल किया। परिवादी का यह कृत्य निदंनीय है। पिता के रूप में पुत्री के प्रति जो अपराध हुआ, उसमें समझौता करना एक पिता के लिए अशोभनीय है।

यह था मामला

गत वर्ष 25 अगस्त-2015 को प्रिया गुरानी पत्नी प्रफुल्ल बजाज ने ससुराल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। प्रिया के पिता मोहनलाल ने प्रताडऩा का आरोप लगाकर मामला दर्ज करवाया। उन्होंने बताया कि ससुरालजनों ने रात एक बजे उसकी आत्महत्या की सूचना दी और वे मौके पर पहुंचे तो उसका चेहरा नीला था। उन्हें शक हुआ कि ससुरालजनों ने जहर देकर मार दिया।

ननद को भी बनाया था आरोपित

पुलिस ने सास सौरठ बजाज, ससुर निर्मल बजाज व ननद हर्षिता को आरोपित बनाया। अनुसंधान में पुलिस ने ननद व ससुर को बाहर निकाल सास के विरुद्ध चालान पेश किया। पुलिस ने चालान में अनुसंधान शेष का हवाला देकर बाद में एफआर लगा दी। इसके खिलाफ मोहनलाल ने न्यायालय में प्रार्थना पत्र पेशकर ननद हर्षिता के खिलाफ भी पर्याप्त साक्ष्य बताकर प्रसंज्ञान लिए आवेदन किया। न्यायालय ने दो अप्रेल को अर्जी स्वीकार कर टिप्पणी की कि हर्षिता के खिलाफ अनुसंधान अधिकारी ने जांच ही नहीं की। जांच होती तो विधि की प्रक्रिया अलग होती, जबकि उसके खिलाफ गंभीर आरोप है। मामले में हर्षिता की प्रत्यक्ष व स्पष्ट भागीदारी है।

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