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शोले के जय-वीरू सी दोस्ती के लिए अपनाएं ये 9 गोल्डन टिप्स

2016-08-07 13:57:59

शोले के जय-वीरू सी दोस्ती के लिए अपनाएं ये 9 गोल्डन टिप्स


शोले के जय-वीरू सी दोस्ती के लिए अपनाएं ये 9 गोल्डन टिप्स
सान्निध्य का सम्मानपूर्वक आनंद लेना ही मैत्री है। मित्रता (अर्थात दोस्ती) का आधार सम्मान होता है। बगैर अपनत्व के मैत्री नहीं हो सकती। यह दो लोगों के बीच सिर्फ मेल नहीं, बल्कि एक पारस्परिक बंधन है। इसलिए, मित्र बनाना और मित्र पाना इंसान के जीवन का सबसे बड़ा सुख है।

बुद्ध जीवन पर्यन्त स्वयं को मैत्री का संदेश वाहक कहते रहे। जब वे विदा होने लगे, तब भी उन्होंने यही कहा, मैं अगली बार मैत्रेय बनकर आऊंगा और सारी दुनिया में मैत्री का संदेश दूंगा। बुद्ध की जातक कथाओं का मूल संदेश मैत्री ही तो है। वस्तुत: मैत्री जीवन की अनिवार्यता है। अगर अपना कहने वाला ही कोई न हो, तो फिर जीवन का अर्थ भी क्या रह जाएगा?

मैत्री का मतलब है समतरंगता, सम्यक् सहयोग। मित्र वह है जो आपका कल्याण सोचे, जो आपके लिए प्रतिबद्ध हो, जिस पर आप विश्वास करें और जो आप पर विश्वास करे, जिसके पास बैठकर समय का बोध न रहे। ऐसी मैत्री के लिए सात चीजें जरूरी हैं-सम्यक् सम्मान, सम्यक् दायित्व, सम्यक् प्रशंसा, सम्यक् उदारता, सम्यक् क्षमा, सम्यक् मंगल एवं सम्यक् अहोभाव।

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